एशियाई खेलों में भारतीय खेल इतिहास ने एक नया और स्वर्णिम अध्याय लिखा है। रविवार को 36 वर्षीय अनुभवी एथलीट सुचिका तारियाल ने महिलाओं के 60 किलोग्राम वर्ग के क्वार्टर फाइनल मुकाबले में मंगोलिया की ओल्तनचिमेग बायगाल्मा को 2-0 से शिकस्त देकर सेमीफाइनल में अपनी जगह पक्की कर ली। इस शानदार जीत के साथ ही सुचिका ने भारत के लिए कम से कम कांस्य पदक सुनिश्चित कर लिया है, जो एशियाई खेलों में पहली बार शामिल हुए मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स (MMA) में भारत का पहला ऐतिहासिक पदक है।
12 साल की उम्र की एक घटना और आत्मरक्षा से शुरुआत
सुचिका तारियाल का यहां तक पहुंचने का सफर काफी प्रेरणादायक रहा है। महज 12 साल की उम्र में एक अप्रिय घटना का सामना करने के बाद उन्होंने अपनी सुरक्षा खुद करने के लिए जूडो सीखने का फैसला किया था। उस समय उन्होंने शायद ही कभी सोचा होगा कि यही फैसला उन्हें एक दिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का प्रतिनिधित्व करने तक ले जाएगा। जूडो से अपने खेल करियर की शुरुआत करने वाली सुचिका ने आठ बार राष्ट्रीय जूडो चैंपियनशिप का खिताब अपने नाम किया है। इसके बाद उन्होंने साल 2017 में मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स (MMA) की दुनिया में कदम रखा।
सात साल का लंबा ब्रेक और शानदार वापसी
साल 2017 में एमएमए का पहला मुकाबला जीतने के बाद सुचिका ने कुछ समय के लिए इस खेल से दूरी बना ली और पूरी तरह से जूडो तथा जुजुत्सु पर ध्यान केंद्रित किया। इस दौरान उन्होंने कॉमनवेल्थ और साउथ एशियाई खेलों में कई स्वर्ण और रजत पदक जीते। इसके बाद दिसंबर 2024 में उन्होंने बहरीन में एक प्रतियोगिता के जरिए पेशेवर मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स में धमाकेदार वापसी की। सुचिका का मानना है कि जूडो के उनके पुराने अनुभव ने उन्हें एमएमए के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार किया, जिससे उन्हें मैट पर प्रतिद्वंद्वी को नियंत्रित करने में बड़ी मदद मिली।
दूसरे एशियन गेम्स में मिला सफलता का मुकाम
सुचिका का यह दूसरा एशियाई खेल है। इससे पहले उन्होंने २०२२ के एशियन गेम्स में कुराश स्पर्धा में हिस्सा लिया था, जहां पर्याप्त तैयारी न होने के कारण उन्हें मनचाहा परिणाम नहीं मिला था। हालांकि, इस बार उन्होंने केंद्रीय खेल मंत्रालय की विशेष सहायता योजना के तहत अपनी तैयारी पूरी की और इस साल जनवरी तथा मई में आयोजित एशियाई एमएमए चैंपियनशिप में लगातार दो कांस्य पदक जीतकर अपने हौसले को बुलंद किया।
देश की बेटियों के लिए प्रेरणास्रोत बनीं सुचिका
सिर्फ खेल के मैदान पर ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर भी सुचिका एक जानी-पहचाने चेहरा हैं, जहां उनके तीन लाख से अधिक फॉलोअर्स हैं। अपनी अंतरराष्ट्रीय सफलताओं के लिए उन्हें देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से भी सम्मान मिल चुका है। पदक पक्का होने के बाद भी सुचिका अभी अपनी जीत से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं और उनका पूरा ध्यान आगामी मुकाबलों पर है। उन्होंने युवा लड़कियों और अभिभावकों को संदेश देते हुए कहा कि आज के दौर में लड़कियों के लिए आत्मरक्षा की कला सीखना बेहद जरूरी है, और माता-पिता को भी अपनी बेटियों को खेलकूद के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।