आमतौर पर यह माना जाता है कि नई पीढ़ी, विशेषकर जेन-जी, सामाजिक समानता और आधुनिक मूल्यों की समर्थक है। किंतु हाल ही में सामने आई एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन रिपोर्ट ने इस धारणा पर नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं। इस अध्ययन में पाया गया कि कई युवा पुरुष अब भी विवाह और पारिवारिक भूमिकाओं को पारंपरिक नजरिये से देखते हैं। इस शोध में विभिन्न देशों के हजारों लोगों से बातचीत की गई, जिसमें रिश्तों, समानता और लैंगिक भूमिकाओं को लेकर उनके विचारों को समझने का प्रयास किया गया। परिणामों ने यह संकेत दिया कि आधुनिक जीवनशैली के बावजूद कई युवा पुरुषों की सोच में पारंपरिक दृष्टिकोण का प्रभाव अब भी मौजूद है।
पत्नी की भूमिका को लेकर पारंपरिक नजरिया
अध्ययन में यह तथ्य सामने आया कि जेन-जी के लगभग 31% पुरुषों का मानना है कि पत्नी को हमेशा पति की बात माननी चाहिए। इसी के साथ लगभग 33% युवाओं ने यह भी कहा कि महत्वपूर्ण पारिवारिक निर्णयों में अंतिम निर्णय पति का होना चाहिए। इन आंकड़ों ने इसलिए भी ध्यान खींचा है क्योंकि नई पीढ़ी से सामान्यतः अधिक प्रगतिशील दृष्टिकोण की अपेक्षा की जाती है। वहीं महिलाओं की राय इससे काफी अलग दिखाई दी। जेन-जी की केवल लगभग 18% महिलाओं ने इस विचार से सहमति जताई कि पत्नी को पति की बात माननी चाहिए।
कामकाजी महिलाओं को लेकर मिला मिश्रित दृष्टिकोण
अध्ययन में यह भी पाया गया कि युवा पुरुषों की सोच पूरी तरह पारंपरिक नहीं है। कई प्रतिभागियों ने कहा कि वे उन महिलाओं की प्रशंसा करते हैं जो अपने पेशेवर जीवन में सफल हैं। लगभग 41% युवा पुरुषों ने माना कि सफल करियर वाली महिलाएं अधिक आकर्षक लगती हैं। हालांकि इसके साथ ही एक विरोधाभास भी सामने आया। लगभग 24% युवा पुरुषों का मानना था कि महिलाओं को अत्यधिक स्वतंत्र या आत्मनिर्भर नहीं दिखना चाहिए। यह आंकड़ा दर्शाता है कि आधुनिकता और पारंपरिक सोच के बीच एक प्रकार का द्वंद्व अभी भी मौजूद है।
मर्दानगी को लेकर परंपरागत धारणाए
सर्वे में पुरुषत्व या मर्दानगी की धारणा पर भी सवाल पूछे गए। कई युवा पुरुषों ने यह माना कि पुरुषों को शारीरिक रूप से मजबूत और कठोर दिखने की कोशिश करनी चाहिए, भले ही वह उनके स्वभाव का हिस्सा न हो। लगभग 43% प्रतिभागियों ने इस विचार का समर्थन किया। इसके अलावा लगभग 30% युवाओं ने यह भी कहा कि पुरुषों को अपने पुरुष मित्रों के प्रति भावनात्मक अभिव्यक्ति, जैसे प्रेम या स्नेह के शब्द, व्यक्त नहीं करने चाहिए। इससे यह संकेत मिलता है कि भावनाओं को व्यक्त करने को लेकर सामाजिक झिझक अब भी बनी हुई है।
पालन-पोषण की जिम्मेदारी पर भी दिखा अंतर
पारिवारिक जिम्मेदारियों को लेकर भी अध्ययन में दिलचस्प तथ्य सामने आए। लगभग 21% युवा पुरुषों का मानना था कि जो पुरुष बच्चों की देखभाल में अधिक भाग लेते हैं, उन्हें कम मर्दाना माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह धारणा समाज में लंबे समय से चली आ रही पारंपरिक सोच का परिणाम हो सकती है। हालांकि धीरे-धीरे सामाजिक परिवर्तन हो रहा है, लेकिन यह अध्ययन दर्शाता है कि विचारों में बदलाव की प्रक्रिया अभी पूरी तरह नहीं हुई है।
सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया अभी जारी
विश्लेषकों का मानना है कि यह परिणाम इस बात का संकेत हैं कि सामाजिक परिवर्तन एक जटिल और धीमी प्रक्रिया है। आधुनिक शिक्षा, डिजिटल संस्कृति और वैश्विक संवाद के बावजूद कई पारंपरिक मान्यताएं अभी भी समाज में मौजूद हैं। नई पीढ़ी के भीतर भी विचारों का यह मिश्रण यह दर्शाता है कि समानता और स्वतंत्रता की अवधारणा पर चर्चा अभी भी जारी है। भविष्य में शिक्षा, संवाद और सामाजिक जागरूकता के माध्यम से इन दृष्टिकोणों में और परिवर्तन देखने को मिल सकता है।
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