अंतरिक्ष में स्थापित उपग्रह मानव जीवन के कई महत्वपूर्ण कार्यों में सहायता करते हैं। मौसम की जानकारी देना, संचार व्यवस्था बनाए रखना, पर्यावरण और ग्रीनहाउस गैसों का अध्ययन करना तथा दूरस्थ तारों का निरीक्षण करना जैसे अनेक कार्य इन्हीं उपग्रहों के माध्यम से संभव होते हैं। किंतु हर मशीन की तरह इनकी भी एक निश्चित आयु होती है। समय के साथ तकनीकी खराबी, ईंधन की कमी या उपकरणों के निष्क्रिय हो जाने के कारण ये उपग्रह अपना कार्य बंद कर देते हैं। ऐसे में वैज्ञानिकों के सामने यह प्रश्न आता है कि इन पुराने उपग्रहों को सुरक्षित तरीके से कैसे हटाया जाए ताकि वे अन्य सक्रिय उपग्रहों के लिए खतरा न बनें।
निम्न कक्षा वाले उपग्रहों का अंत
जो उपग्रह पृथ्वी की अपेक्षाकृत कम ऊंचाई वाली कक्षाओं में स्थापित होते हैं, उन्हें हटाने का तरीका अपेक्षाकृत सरल होता है। वैज्ञानिक उनमें शेष बचे ईंधन का उपयोग करके उनकी गति कम कर देते हैं, जिससे वे धीरे-धीरे अपनी कक्षा से नीचे आने लगते हैं। जब ये उपग्रह पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं तो अत्यधिक वेग और वायु के घर्षण के कारण उनमें तीव्र गर्मी उत्पन्न होती है। इस प्रक्रिया में अधिकांश छोटे उपग्रह पूरी तरह जलकर नष्ट हो जाते हैं और उनका कोई मलबा पृथ्वी तक नहीं पहुंचता। यह तरीका सुरक्षित और प्रभावी माना जाता है।
विशाल यानों के लिए समुद्री ‘कब्रिस्तान’
कुछ बड़े अंतरिक्ष यान, अंतरिक्ष स्टेशन या भारी उपग्रह पूरी तरह वायुमंडल में जल नहीं पाते। ऐसे मामलों में वैज्ञानिक नियंत्रित तरीके से उन्हें पृथ्वी पर गिराते हैं। इसके लिए प्रशांत महासागर का एक अत्यंत दूरस्थ क्षेत्र चुना गया है, जिसे अनौपचारिक रूप से “अंतरिक्ष यान का कब्रिस्तान” कहा जाता है। यह स्थान पृथ्वी के सबसे निर्जन समुद्री क्षेत्रों में से एक है, जहां आसपास कोई आबादी नहीं है और जहाजों की आवाजाही भी बहुत कम होती है। इसी कारण बड़े अंतरिक्ष यानों को नियंत्रित ढंग से यहीं गिराया जाता है ताकि किसी प्रकार की जनहानि या क्षति की संभावना न रहे।
क्या है ‘ग्रेवयार्ड ऑर्बिट’
कुछ उपग्रह पृथ्वी से बहुत अधिक ऊंचाई वाली कक्षाओं में स्थापित होते हैं। उन्हें पृथ्वी के वायुमंडल में वापस लाने के लिए अत्यधिक ईंधन की आवश्यकता पड़ती है, जो प्रायः उपलब्ध नहीं होता। ऐसी स्थिति में वैज्ञानिक उन्हें एक विशेष कक्षा में भेज देते हैं जिसे “ग्रेवयार्ड ऑर्बिट” कहा जाता है। यह कक्षा सामान्य भू-स्थिर कक्षा से लगभग 200 से 300 किलोमीटर ऊपर स्थित होती है, जहां निष्क्रिय उपग्रहों को सुरक्षित रूप से स्थानांतरित कर दिया जाता है। वहां वे सक्रिय उपग्रहों के मार्ग से दूर रहते हैं और टकराव का खतरा कम हो जाता है। कई बार ये उपग्रह हजारों वर्षों तक उसी कक्षा में बने रह सकते हैं।
अंतरिक्ष कचरे का बढ़ता खतरा
पुराने उपग्रहों को हटाना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि पृथ्वी की कक्षा में अंतरिक्ष कचरे की मात्रा लगातार बढ़ रही है। सक्रिय उपग्रहों के साथ-साथ लाखों छोटे-छोटे धातु और यांत्रिक टुकड़े अंतरिक्ष में घूम रहे हैं, जो किसी भी समय टकराव का कारण बन सकते हैं। यदि एक बड़ा टकराव होता है तो उससे असंख्य छोटे टुकड़े बन जाते हैं, जो आगे और टक्करों को जन्म दे सकते हैं। इस प्रकार की श्रृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया को वैज्ञानिक “केसलर प्रभाव” कहते हैं। यदि यह स्थिति गंभीर हो जाए तो संचार, दिशा-निर्धारण और मौसम पूर्वानुमान जैसी महत्वपूर्ण सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।
अंतरिक्ष की सुरक्षा के लिए जरूरी प्रबंधन
इसी कारण विश्व की अंतरिक्ष एजेंसियां अब उपग्रहों के जीवनचक्र के अंत को ध्यान में रखते हुए योजनाएं बना रही हैं। नए उपग्रहों को इस प्रकार डिजाइन किया जा रहा है कि उनकी आयु समाप्त होने पर उन्हें सुरक्षित तरीके से हटाया जा सके। इस प्रयास का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पृथ्वी की कक्षा भविष्य में भी सुरक्षित और उपयोग योग्य बनी रहे तथा अंतरिक्ष अनुसंधान और संचार प्रणालियां बिना बाधा के चलती रहें।
Comments (0)