14 अप्रैल को खरमास के समापन के साथ ही जीवन में शुभता और उत्सव का दौर पुनः प्रारंभ हो जाएगा। इस अवधि में रुके हुए विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य मांगलिक कार्य अब पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न किए जा सकेंगे। समाज में एक बार फिर उत्साह और उल्लास का वातावरण देखने को मिलेगा।
अक्षय तृतीया का अबूझ मुहूर्त और विवाहों की धूम
इस वर्ष अक्षय तृतीया का पर्व विशेष महत्व लेकर आया है। 19 अप्रैल को पड़ने वाली यह तिथि अबूझ मुहूर्त के रूप में जानी जाती है, जिसमें बिना पंचांग देखे भी विवाह जैसे शुभ कार्य किए जा सकते हैं। इस दिन विवाह स्थलों की भारी मांग देखी जा रही है, जिससे यह स्पष्ट है कि लोग इस अवसर का भरपूर लाभ उठाना चाहते हैं।
अप्रैल और मई में शुभ तिथियों की बहार
खरमास के बाद अप्रैल और मई माह में कई शुभ तिथियां उपलब्ध हैं, जो विवाह और अन्य सामाजिक आयोजनों के लिए अनुकूल मानी जा रही हैं। इन तिथियों में पारिवारिक समारोहों की संख्या बढ़ेगी, जिससे समाज में सामूहिक आनंद और पारंपरिक उत्सव का माहौल सशक्त होगा।
मलमास के कारण पुनः लगेगा विराम
हालांकि यह शुभ समय सीमित अवधि के लिए ही रहेगा, क्योंकि 17 मई से मलमास का आरंभ हो जाएगा। यह अवधि 15 जून तक चलेगी, जिसमें विवाह और अन्य मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं। इस दौरान धार्मिक अनुष्ठान, दान और साधना को विशेष महत्व दिया जाता है।
ज्योतिषीय गणना और अधिक मास का महत्व
अधिक मास का संबंध सूर्य और चंद्र कैलेंडर के बीच संतुलन स्थापित करने से है। चंद्र वर्ष और सूर्य वर्ष के बीच उत्पन्न समय अंतर को संतुलित करने के लिए एक अतिरिक्त मास जोड़ा जाता है। यह प्रक्रिया वैदिक गणना का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो समय के संतुलन और धार्मिक परंपराओं को बनाए रखने में सहायक होती है।
देवशयनी एकादशी के बाद फिर बदलेगा समय
15 जून के बाद शुभ कार्य पुनः प्रारंभ होंगे, लेकिन 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी के आगमन के साथ ही एक बार फिर मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाएगा। इस प्रकार वर्ष भर में शुभ और अशुभ समय का चक्र निरंतर चलता रहता है।
समाज और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
शुभ मुहूर्तों का प्रभाव केवल धार्मिक जीवन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा असर सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ता है। विवाह और आयोजनों की बढ़ती संख्या से बाजारों में चहल-पहल बढ़ती है और विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां तेज हो जाती हैं।