वाराणसी. अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर श्री काशी विश्वनाथ धाम में पारंपरिक विधि-विधान के साथ अनेक धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया गया। मंदिर न्यास द्वारा सनातन परंपराओं का निर्वहन करते हुए भगवान विश्वनाथ की विशेष पूजा-अर्चना की गई। पूरे धाम में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार स्पष्ट रूप से अनुभव किया गया, जहां हर ओर श्रद्धा और भक्ति का वातावरण बना रहा।
भगवान बद्रीनारायण स्वरूप का दिव्य श्रृंगार
इस अवसर पर भगवान श्रीहरि विष्णु के बद्रीनारायण स्वरूप का भव्य और मनोहारी श्रृंगार किया गया। श्रृंगार के दौरान विभिन्न पुष्पों और पारंपरिक अलंकरणों का उपयोग कर देव स्वरूप को अलौकिक आभा प्रदान की गई। यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत आकर्षण का केंद्र बना और उन्होंने इसे दिव्य अनुभूति के रूप में अनुभव किया।
‘कुंवरा’ परंपरा की शुरुआत
मंदिर न्यास ने अक्षय तृतीया से श्रावण मास तक चलने वाली ‘कुंवरा’ परंपरा का भी शुभारंभ किया। इस परंपरा के तहत भगवान विश्वनाथ के विग्रह पर निरंतर जलाभिषेक के लिए विशेष शॉवर व्यवस्था स्थापित की जाती है। यह परंपरा न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि गर्मी के मौसम में शिवलिंग पर जल अर्पण की सतत प्रक्रिया को भी सुनिश्चित करती है।
विशेष अभिषेक और भोग आरती का आयोजन
मध्यान्ह भोग आरती के समय भगवान श्री विश्वेश्वर का विभिन्न फलों के रस से विशेष अभिषेक किया गया। इस अनुष्ठान ने वातावरण को और अधिक पवित्र और दिव्य बना दिया। श्रद्धालुओं ने इस दौरान भक्ति भाव से आरती में सहभागिता की और भगवान से सुख-समृद्धि की कामना की।
श्रद्धालुओं के लिए सेवा और शीतलता की व्यवस्था
बढ़ती गर्मी को ध्यान में रखते हुए मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं और कार्मिकों के लिए विशेष शीतल पेय की व्यवस्था की गई। बेल, नींबू और दही से बने शरबत का वितरण कर सेवा भाव का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया गया। इस पहल ने धाम में उपस्थित लोगों को राहत प्रदान करने के साथ-साथ सेवा और समर्पण की भावना को भी प्रकट किया।
आस्था का जनसैलाब और भक्ति का अद्भुत दृश्य
अक्षय तृतीया के इस अवसर पर धाम में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। भक्तों ने विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेकर अपनी आस्था व्यक्त की। मंदिर परिसर ‘बम-बम भोले’ के जयघोष से गूंज उठा, जिससे काशी की आध्यात्मिक पहचान और अधिक प्रखर हो उठी।
परंपरा और आस्था का जीवंत उत्सव
अक्षय तृतीया पर आयोजित ये अनुष्ठान केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की जीवंत अभिव्यक्ति हैं। श्री काशी विश्वनाथ धाम में संपन्न हुए इन कार्यक्रमों ने यह सिद्ध कर दिया कि परंपरा, भक्ति और सेवा का संगम आज भी उतनी ही श्रद्धा और ऊर्जा के साथ जीवित है।