यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में वाराणसी में आयोजित तीन दिवसीय ‘सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य’ के शुभारंभ अवसर पर भारतीय सिनेमा की भूमिका और उसके सामाजिक प्रभाव को लेकर एक महत्वपूर्ण बयान दिया। उनका यह वक्तव्य न केवल फिल्म उद्योग बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों में चर्चा का विषय बन गया है।
सिनेमा समाज को दिशा देने वाली एक सशक्त सांस्कृतिक शक्ति है
सीएम योगी ने अपने संबोधन में कहा कि, सिनेमा मात्र मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज को दिशा देने वाली एक सशक्त सांस्कृतिक शक्ति है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत का सिनेमा जब देश के मूल्यों, परंपराओं और आदर्शों को प्रस्तुत करता है, तब उसे व्यापक स्वीकृति मिलती है। लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब फिल्मों में अपराधियों और डकैतों को नायक के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति बढ़ी, जो समाज के लिए चिंताजनक है।
फिल्में युवाओं की सोच को प्रभावित करती हैं
इस दौरान उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि, अगर किसी डकैत को आप हीरो के रूप में प्रस्तुत करेंगे, तो युवा पीढ़ी उस डकैत को अपना आदर्श मानने लगेगी। उनके इस बयान का संकेत उन फिल्मों की ओर था, जिनमें अपराध जगत से जुड़े किरदारों को ग्लैमर और सहानुभूति के साथ दिखाया जाता है। योगी आदित्यनाथ का मानना है कि इस तरह की प्रस्तुतियां युवाओं की सोच को प्रभावित कर सकती हैं और उन्हें गलत दिशा में प्रेरित कर सकती हैं।
सिनेमा एक रचनात्मक मंच है - सीएम योगी
मुख्यमंत्री योगी ने कलाकारों, फिल्म निर्देशकों और निर्माताओं से अपील की कि वे ऐसी फिल्मों का निर्माण करें जो राष्ट्र निर्माण में योगदान दें और समाज को सकारात्मक दिशा प्रदान करें। उन्होंने कहा कि सिनेमा एक रचनात्मक मंच है, जो समाज में जागरूकता फैलाने और नई पीढ़ी को सही मार्ग दिखाने का कार्य कर सकता है। इसलिए इसकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।
सिनेमा का काम समाज की वास्तविकता को दिखाना
हालांकि, इस मुद्दे पर फिल्म उद्योग और बुद्धिजीवियों के बीच मतभेद भी देखने को मिलते हैं। कई फिल्मकारों का मानना है कि सिनेमा का काम केवल आदर्श प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि समाज की वास्तविकता को दिखाना भी है। उनके अनुसार, फिल्मों में अपराधियों या डकैतों के जीवन को दिखाना समाज के उन पहलुओं को सामने लाता है, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। ऐसे किरदारों के माध्यम से सामाजिक असमानता, अन्याय और व्यवस्था की खामियों को भी उजागर किया जाता है।
सिनेमा समाज का दर्पण है
वर्तमान समय में जब डिजिटल प्लेटफॉर्म और सिनेमा का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, यह बहस और भी प्रासंगिक हो जाती है। एक ओर जहां सिनेमा समाज का दर्पण है, वहीं दूसरी ओर वह समाज को दिशा देने का भी माध्यम है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि फिल्म निर्माता इस संतुलन को समझें और ऐसी कहानियां प्रस्तुत करें जो न केवल रोचक हों, बल्कि समाज के लिए सकारात्मक संदेश भी दें।