पश्चिम बंगाल में बांग्ला नववर्ष ‘पोइला बैसाख’ के मौके पर सियासी सरगर्मी चरम पर पहुंच गई। दक्षिण कोलकाता के गरिया ब्रह्मपुर इलाके में टीएमसी नेता और मंत्री अरूप विश्वास के नेतृत्व में ‘माछ-भात-ए बांगाली’ थीम पर भव्य शोभायात्रा निकाली गई। इस दौरान पारंपरिक लाल-सफेद साड़ियों में महिलाएं, लोक कलाकार और सांस्कृतिक झांकियां नजर आईं, जिससे बंगाली अस्मिता और खान-पान को प्रमुखता से दिखाया गया।
भाजपा पर TMC का बड़ा आरोप:
रैली के दौरान अरूप विश्वास ने भाजपा पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि भाजपा की नीतियां बंगालियों की खान-पान की स्वतंत्रता के खिलाफ हैं। उनका दावा था कि भाजपा शासित राज्यों में मछली और मांस बेचने वालों को परेशान किया जाता है। साथ ही उन्होंने यह भी आशंका जताई कि अगर बंगाल में भाजपा सत्ता में आती है, तो ‘माछ-भात’ जैसी पारंपरिक थाली पर भी असर पड़ सकता है।
भाजपा का अलग अंदाज में जवाब:
टीएमसी के आरोपों का जवाब देने के लिए भाजपा नेताओं ने भी अनोखा तरीका अपनाया। बैरकपुर से उम्मीदवार कौस्तुभ बागची हाथ में मछली लेकर सड़कों पर उतरे और चुनाव प्रचार किया। उन्होंने जनता के बीच संदेश दिया कि भाजपा बंगाल की संस्कृति और खान-पान का सम्मान करती है। इस दौरान उन्होंने नारा दिया कि “बंगाली माछ-भात के साथ और अब भाजपा के साथ भी।”
मत्स्य उत्पादन को लेकर आरोप-प्रत्यारोप:
भाजपा प्रवक्ता देबजीत सरकार ने टीएमसी पर पलटवार करते हुए कहा कि असल समस्या भाजपा नहीं, बल्कि राज्य में गिरता मछली उत्पादन है। उन्होंने आरोप लगाया कि टीएमसी सरकार के दौरान बड़े पैमाने पर तालाबों और जलाशयों को खत्म कर रियल एस्टेट को बढ़ावा दिया गया, जिससे स्थानीय मत्स्य उद्योग प्रभावित हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि अब बंगाल को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए गुजरात और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से मछली मंगानी पड़ रही है।
शुभेंदु अधिकारी का चुनावी संदेश:
विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने भी इस मौके पर सक्रिय प्रचार किया। उन्होंने कोलकाता के ठनठनिया कालीबाड़ी मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद शोभायात्रा में हिस्सा लिया। जनता को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य ने लंबे समय तक अलग-अलग सरकारों को मौका दिया है, लेकिन अब वास्तविक परिवर्तन के लिए भाजपा को पांच साल देना चाहिए।
चुनावी माहौल में नया मुद्दा:
आगामी मतदान से पहले यह साफ हो गया है कि बंगाल की राजनीति अब केवल विकास, रोजगार और कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है। ‘माछ-भात’ जैसे मुद्दों के जरिए सांस्कृतिक पहचान और खान-पान की आजादी भी चुनावी बहस का अहम हिस्सा बन चुकी है। पोइला बैसाख जैसे सांस्कृतिक पर्व पर छिड़ी यह सियासत आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है।