कोलकाता: क्या कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज (CSE) एक बार फिर अपनी पुरानी पहचान हासिल कर पाएगा? इस सवाल पर भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के चेयरमैन ने अहम जानकारी दी है। कोलकाता में बंगाल चैंबर ऑफ कॉमर्स की ओर से आयोजित एक सम्मेलन में शामिल हुए SEBI चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने स्टॉक एक्सचेंज के भविष्य और उसे दोबारा सक्रिय करने की संभावनाओं पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि CSE को फिर से शुरू करने के लिए कई वित्तीय, तकनीकी और बुनियादी ढांचागत शर्तों को पूरा करना होगा।
2004 से शुरू हुईं मुश्किलें, धीरे-धीरे ठप हुआ कारोबार
SEBI के अनुसार, कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज का इतिहास काफी पुराना है, लेकिन वर्ष 2004 से ही इसके प्रशासनिक और बुनियादी ढांचे से जुड़ी समस्याएं सामने आने लगी थीं। वर्ष 2005 में डिम्यूचुअलाइजेशन की प्रक्रिया पूरी हुई, लेकिन इसके बाद क्लियरिंग और सेटलमेंट से संबंधित परेशानियां बनी रहीं।
वर्ष 2012 में SEBI ने नए नियम लागू किए। इनके तहत किसी स्टॉक एक्सचेंज के लिए सालाना कम से कम 1,000 करोड़ रुपये का कारोबार करना जरूरी किया गया। निर्धारित सीमा पूरी नहीं करने वाले एक्सचेंज को बाहर निकलने की प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता था। उस समय CSE का सालाना कारोबार महज 90 करोड़ रुपये के आसपास था। इसके बाद 2013-14 तक अपने प्लेटफॉर्म पर कारोबार भी बंद हो गया।
2025 में CSE ने खुद किया बाहर निकलने का आवेदन
अदालत के निर्देशों, समय-सीमा में कई बार विस्तार और SEBI के साथ लंबी कानूनी एवं प्रशासनिक प्रक्रिया के बाद 18 फरवरी 2025 को कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज ने खुद ही एक्सचेंज से बाहर निकलने यानी एग्जिट की अनुमति के लिए आवेदन किया।
इस प्रक्रिया में ब्रोकरों के बकाया भुगतान और अन्य वित्तीय देनदारियों का निपटारा भी एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया। CSE की कुछ जमीन बेचकर प्राप्त राशि को एस्क्रो खाते में रखने की अनुमति दी गई है, ताकि उससे वित्तीय देनदारियों का भुगतान किया जा सके।
दोबारा शुरू करना है तो पूरी करनी होंगी ये शर्तें
हालांकि, SEBI के रुख से संकेत मिलता है कि कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज के लिए संभावनाओं के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। लेकिन दोबारा कारोबार शुरू करने के लिए उसे कई अहम शर्तें पूरी करनी होंगी।
इनमें सालाना कम से कम 1,000 करोड़ रुपये के कारोबार की क्षमता विकसित करना, आधुनिक ऑनलाइन ट्रेडिंग सिस्टम तैयार करना, बेहतर निगरानी व्यवस्था (सर्विलांस), साइबर सुरक्षा और मजबूत क्लियरिंग एवं सेटलमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना शामिल है।
इसके अलावा पर्याप्त संख्या में ट्रेडिंग मेंबर्स, मजबूत वित्तीय स्थिति और एक व्यावहारिक कारोबारी योजना भी जरूरी होगी।
सिर्फ एक्सचेंज खोलना काफी नहीं, कारोबार और निवेशकों की भागीदारी भी जरूरी
SEBI का मानना है कि आज के तकनीक आधारित शेयर बाजार में केवल एक स्टॉक एक्सचेंज स्थापित कर देना पर्याप्त नहीं है। उसमें पर्याप्त कारोबार और निवेशकों की सक्रिय भागीदारी भी सुनिश्चित करनी होगी।
अगर किसी एक्सचेंज में लेनदेन कम होता है, तो बाजार में तरलता यानी लिक्विडिटी घट जाती है। इसका सीधा असर निवेशकों की दिलचस्पी पर पड़ सकता है। वहीं, आधुनिक तकनीक और साइबर सुरक्षा के मानकों को बनाए रखने के लिए बड़े निवेश की जरूरत होती है।
ऐसे में CSE को केवल कोलकाता तक सीमित रहने के बजाय राष्ट्रीय स्तर पर दूसरे स्टॉक एक्सचेंजों के साथ प्रतिस्पर्धा करने लायक व्यवस्था भी विकसित करनी होगी।
IPO में आम निवेशकों की हिस्सेदारी पर भी SEBI ने दी जानकारी
इस सम्मेलन में IPO में आम निवेशकों की भागीदारी को लेकर भी SEBI की ओर से जानकारी दी गई। बताया गया कि सामान्य नियमों के तहत IPO का 35 प्रतिशत हिस्सा खुदरा निवेशकों (रिटेल इन्वेस्टर्स) के लिए आरक्षित रहता है। हालांकि, कुछ विशेष श्रेणी की कंपनियों के लिए अलग नियम लागू होते हैं।
SEBI के मुताबिक, दुनिया के कई अन्य बाजारों की तुलना में भारत में IPO के दौरान आम निवेशकों को भागीदारी का अपेक्षाकृत अधिक अवसर मिलता है।
ऐतिहासिक पहचान को वापस पाना CSE के लिए बड़ी चुनौती
कुल मिलाकर, कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज को दोबारा सक्रिय करने की संभावनाएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं, लेकिन इसकी राह आसान भी नहीं है। बकाया वित्तीय देनदारियों का निपटारा, पर्याप्त कारोबार की क्षमता, मजबूत आर्थिक स्थिति और आधुनिक तकनीकी ढांचे का निर्माण इसकी सबसे बड़ी जरूरतें हैं।
ऐसे में सवाल सिर्फ कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज को दोबारा खोलने का नहीं, बल्कि उसे देश के आधुनिक शेयर बाजार में प्रतिस्पर्धा करने लायक बनाने का है। अब देखना होगा कि CSE अपनी ऐतिहासिक पहचान को फिर से स्थापित करने की दिशा में कितना आगे बढ़ पाता है।