कोलकाता: आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष को भ्रष्टाचार के मामले में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में बयानबाजी तेज हो गई है। विपक्षी दलों की ओर से केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं और भारतीय जनता पार्टी (BJP) को भी निशाने पर लिया जा रहा है। इस बीच, बंगाल भाजपा अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद शमिक भट्टाचार्य ने स्पष्ट किया है कि जमानत मिलना किसी व्यक्ति के निर्दोष होने का प्रमाण नहीं है।
कानून भावनाओं से नहीं चलता: शमिक भट्टाचार्य
शमिक भट्टाचार्य ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में कहा कि कानून भावनाओं के आधार पर काम नहीं करता और जमानत पाना किसी भी व्यक्ति का कानूनी अधिकार है। उन्होंने कहा कि आरजी कर मामले में 'अभया' आंदोलन से जुड़े लोग सुप्रीम कोर्ट के फैसले से निराश हो सकते हैं, लेकिन कानूनी प्रक्रिया को भावनाओं से प्रभावित नहीं किया जा सकता।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने जोर देकर कहा कि संदीप घोष को जमानत मिलने का यह अर्थ नहीं है कि उन्हें आरोपों से बरी कर दिया गया है या उनके खिलाफ दर्ज मामलों में उनकी कोई भूमिका नहीं है। उनके मुताबिक, जमानत अदालत का एक कानूनी फैसला है, जिसे दोषमुक्त होने के बराबर नहीं माना जाना चाहिए।
वित्तीय अनियमितताओं और मेरिट लिस्ट में हेरफेर के आरोप
संदीप घोष के खिलाफ आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में कथित वित्तीय अनियमितताओं और अयोग्य उम्मीदवारों को लाभ पहुंचाने के लिए मेरिट लिस्ट में कथित हेरफेर से जुड़े आरोपों की जांच की जा रही है। इसी भ्रष्टाचार मामले में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत दी।
इस फैसले के बाद जांच एजेंसी की भूमिका को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने भाजपा पर सवाल उठाए हैं, जबकि शमिक भट्टाचार्य ने कहा कि जमानत मिलने को आरोपों से मुक्ति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि जमानत के फैसले में कानूनी और तकनीकी पहलुओं की भूमिका हो सकती है।
9 अगस्त 2024 की घटना के बाद चर्चा में आए संदीप घोष
9 अगस्त 2024 को कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में ड्यूटी के दौरान एक महिला प्रशिक्षु डॉक्टर के साथ दुष्कर्म और हत्या की घटना सामने आई थी। इस घटना ने पूरे पश्चिम बंगाल को झकझोर दिया था। न्याय की मांग को लेकर राज्यभर में विरोध प्रदर्शन हुए और 'अभया' आंदोलन ने व्यापक रूप ले लिया।
इसी दौरान अस्पताल के तत्कालीन प्रिंसिपल संदीप घोष से जुड़े विभिन्न मामलों और कथित अनियमितताओं को लेकर भी सवाल उठने लगे। दुष्कर्म-हत्या मामले और भ्रष्टाचार के मामले अलग-अलग कानूनी प्रकरण हैं, जिनकी जांच और न्यायिक प्रक्रिया भी अलग रही है।
करीब दो साल की हिरासत और धीमी सुनवाई का दिया गया हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने संदीप घोष को भ्रष्टाचार मामले में जमानत देते समय उनकी लंबे समय से जारी न्यायिक हिरासत और मुकदमे की सुनवाई में हो रही देरी पर विचार किया। इससे पहले विशेष सीबीआई अदालत और कलकत्ता हाईकोर्ट में उनकी जमानत याचिकाएं खारिज हो चुकी थीं। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
इससे पहले दिसंबर 2024 में सियालदह अदालत ने दुष्कर्म और हत्या के मामले में संदीप घोष को जमानत दी थी। इसकी वजह सीबीआई की ओर से निर्धारित 90 दिनों की अवधि में आरोपपत्र दाखिल नहीं किया जाना था। हालांकि, भ्रष्टाचार के मामले में उन्हें राहत नहीं मिली थी और वह जेल में ही थे।
भ्रष्टाचार मामले में कानूनी कार्रवाई की अनुमति
पश्चिम बंगाल सरकार को 18 मई 2026 को भ्रष्टाचार मामले में संदीप घोष के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की अनुमति मिली थी। इसके बाद मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रही।
शमिक भट्टाचार्य ने एक बार फिर कहा कि संदीप घोष को मिली जमानत को उनकी बेगुनाही का प्रमाण नहीं माना जा सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी को जमानत मिलना और अदालत में आरोपों से दोषमुक्त होना दो अलग-अलग बातें हैं। भ्रष्टाचार के मामले में अंतिम स्थिति का निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया और अदालत के फैसले से ही होगा।