नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल में चुनाव से ठीक पहले अधिकारियों के बड़े पैमाने पर तबादलों को लेकर ममता बनर्जी सरकार को सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली है। कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग (Election Commission) के निर्देशों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है।
'आस्था की कमी है मुख्य समस्या' - सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य प्रशासन और चुनाव आयोग के बीच **'आस्था की कमी' (Trust Deficit) सबसे बड़ी समस्या है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "आयोग का राज्य पर भरोसा नहीं है और राज्य का आयोग पर पूर्ण विश्वास नहीं है। अधिकारियों का तबादला कोई नई बात नहीं है और चुनाव के दौरान पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए ऐसे कदम उठाए जाते हैं।"
कल्याण बनर्जी की दलीलें और कोर्ट का रुख
तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी ने दलील दी कि राज्य के करीब 1,100 अधिकारियों का तबादला बिना राज्य सरकार की सलाह के किया गया है। उन्होंने मुख्य सचिव के तबादले पर भी सवाल उठाए। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि सभी अधिकारी पश्चिम बंगाल कैडर के ही हैं, इसलिए इसमें पक्षपात का सवाल नहीं उठता। कोर्ट ने कहा कि अगर बाहरी राज्यों से अधिकारी लाए जाते, तो अदालत हस्तक्षेप पर विचार कर सकती थी।
हाई कोर्ट के फैसले पर मुहर
इससे पहले कलकत्ता हाई कोर्ट की जस्टिस सुजय पाल और जस्टिस पार्थसारथी सेन की पीठ ने राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि चुनाव आयोग के पास निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए प्रशासनिक निर्णय लेने की शक्ति है और आयोग हर तबादले का कारण बताने के लिए बाध्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी रुख को दोहराया है।
मामले की पृष्ठभूमि:
15 मार्च: चुनाव घोषणा के साथ ही मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती और गृह सचिव जगदीश प्रसाद मीणा को पद से हटाया गया।
बड़ी कार्रवाई: एक ही दिन में 267 अधिकारियों, जिनमें बीडीओ और थाना प्रभारी शामिल थे, का तबादला किया गया।
न्यायिक स्थिति: सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी सवालों को भविष्य के लिए लंबित रखा है, लेकिन आगामी चुनावों के मद्देनजर आयोग के आदेश पर रोक लगाने से मना कर दिया है।