पश्चिम बंगाल की राजनीति में मजबूत पहचान बना चुके Suvendu Adhikari को लेकर उनके पुराने दोस्तों और कॉलेज साथियों में खासा उत्साह देखा जा रहा है। पूर्व मेदिनीपुर से निकलकर राज्य की राजनीति में बड़ा चेहरा बने शुभेंदु अधिकारी को उनके करीबी आज भी प्यार से “बुबाइ दा” कहकर बुलाते हैं। उनके पुराने मित्रों का कहना है कि छात्र जीवन से ही उनमें नेतृत्व की झलक साफ दिखाई देती थी। कॉलेज में वे भले ही कम बोलते थे, लेकिन किसी भी मुद्दे को समझने और उसका हल निकालने की उनकी क्षमता उन्हें बाकी छात्रों से अलग बनाती थी।
प्रोफेसरों और छात्रों के बीच थी अलग पहचान
कॉलेज के दिनों को याद करते हुए उनके साथियों ने बताया कि शुभेंदु अधिकारी पढ़ाई और संगठन—दोनों में सक्रिय रहते थे। उनकी स्मरण शक्ति इतनी तेज थी कि वे कई लोगों के फोन नंबर बिना लिखे याद रखते थे। दोस्तों के मुताबिक, कॉलेज कैंपस में उनका अंदाज भी काफी अलग था। अक्सर शांत स्वभाव में रहने वाले शुभेंदु छात्रों और शिक्षकों के बीच समान रूप से लोकप्रिय थे। यही वजह रही कि उन्होंने लगातार दो बार कॉलेज के जनरल सेक्रेटरी पद पर जीत हासिल की थी।
समस्या का हल निकाले बिना नहीं मानते थे
करीबी दोस्तों का कहना है कि छात्र जीवन में अगर कोई साथी किसी परेशानी को लेकर उनके पास पहुंचता था, तो शुभेंदु तब तक चैन से नहीं बैठते थे, जब तक उसका समाधान न निकल जाए। उस समय बंगाल की छात्र राजनीति में वामपंथी संगठनों का दबदबा था, लेकिन शुभेंदु अधिकारी ने अपने अलग विचार और संगठन क्षमता के दम पर छात्र राजनीति में अलग पहचान बनाई। कई युवा उनके काम करने के तरीके से प्रेरित होकर राजनीति से जुड़े।
ऊंचे पद पर पहुंचने के बाद भी नहीं बदला व्यवहार
पुराने मित्र बताते हैं कि राजनीति में बड़ा कद हासिल करने के बाद भी शुभेंदु अधिकारी के स्वभाव में कोई खास बदलाव नहीं आया। आज भी जब वे अपने पुराने साथियों से मिलते हैं, तो रुककर हालचाल पूछते हैं और लंबे समय तक बातचीत करते हैं। उनके दोस्त बताते हैं कि वे अब भी सोशल मीडिया और व्हाट्सएप के जरिए पुराने परिचितों के संपर्क में रहते हैं और समय-समय पर संवाद करते हैं।
दोस्तों को अपने ‘बुबाइ दा’ पर गर्व
शुभेंदु अधिकारी के साथ पढ़ चुके लोगों का कहना है कि उन्हें गर्व है कि उनका पुराना दोस्त आज राज्य की राजनीति में इतना बड़ा नाम बन चुका है। दोस्तों का मानना है कि चाहे राजनीति में उनका कद कितना भी बड़ा हो जाए, वे अपनी जड़ों और पुराने रिश्तों को कभी नहीं भूलेंगे।