नई दिल्ली: भारत की अर्थव्यवस्था और औद्योगिक विकास के बीच नई फैक्ट्रियों की स्थापना को अहम माना जाता है। ऐसे में नई औद्योगिक इकाइयों के निर्माण की धीमी रफ्तार चिंता का विषय बन सकती है। सरकार के नवीनतम एनुअल सर्वे ऑफ इंडस्ट्रीज (ASI) के आंकड़ों में इसी तरह का रुझान सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 के बाद नई फैक्ट्रियों की स्थापना जिस गति से बढ़ रही थी, उसमें अब कमी आई है। पिछले वित्त वर्ष में नई फैक्ट्रियां स्थापित होने की दर 2021 के बाद सबसे कम रही। वहीं, औद्योगिक उत्पादन, रोजगार और कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि के आंकड़े सकारात्मक रहे हैं। यानी मौजूदा उद्योगों में गतिविधियां बढ़ीं, लेकिन नई उत्पादन क्षमता जोड़ने की रफ्तार कमजोर हुई है। यह स्थिति औद्योगिक निवेश और भविष्य की उत्पादन क्षमता को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े करती है।
नई उत्पादन इकाइयों में निवेश की रफ्तार धीमी
नई फैक्ट्रियों और उत्पादन इकाइयों के निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश की जरूरत होती है। ASI के आंकड़ों के अनुसार, औद्योगिक क्षेत्र में नई संपत्तियां जोड़ने की रफ्तार में कमी आई है। ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन (GFCF) के आंकड़े भी इसी ओर संकेत करते हैं। वित्त वर्ष की शुरुआत में इसका आंकड़ा करीब 63,497 करोड़ रुपये रहा। कोरोना काल के बाद इसमें करीब 77 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिली थी। हालांकि, 2025 के अंत तक इसमें गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा फैक्ट्रियों में नई मशीनरी और उपकरण जोड़ने की दर भी पिछले वित्त वर्ष के 6 प्रतिशत से घटकर करीब आधी रह गई। इससे संकेत मिलता है कि नई उत्पादन क्षमता बढ़ाने को लेकर निवेश की गति पहले जैसी नहीं रही।
प्रति कर्मचारी उत्पादन वृद्धि लगभग स्थिर
ASI के आंकड़ों में प्रति कर्मचारी उत्पादन की वृद्धि दर भी बेहद कम रहने की बात सामने आई है। किसी फैक्ट्री में एक कर्मचारी द्वारा सालभर में किए गए उत्पादन को प्रति कर्मचारी उत्पादन दर से मापा जाता है। इस बार यह वृद्धि दर 0.5 प्रतिशत रही, जबकि पिछले वर्ष यह 0.4 प्रतिशत थी। यानी सालाना आधार पर इसमें सुधार तो हुआ, लेकिन वृद्धि बेहद मामूली रही। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यह दर लगभग स्थिर स्थिति में दिखाई देती है। रिपोर्ट में इस रुझान को लंबे समय के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासतौर पर तब, जब औद्योगिक उत्पादन में सकारात्मक वृद्धि का दावा किया जा रहा है। कम उत्पादकता वृद्धि का असर भविष्य में उत्पादन क्षमता और उद्योगों की दक्षता पर भी पड़ सकता है।
मुनाफा बढ़ा, लेकिन वृद्धि दर में आई कमी
औद्योगिक क्षेत्र में फैक्ट्रियों के मुनाफे से जुड़े आंकड़ों में भी मिश्रित तस्वीर देखने को मिली है। औसतन प्रति फैक्ट्री मुनाफे में करीब 5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। हालांकि, पिछले वर्ष यह वृद्धि लगभग 5.5 प्रतिशत रही थी। यानी मुनाफा बढ़ा जरूर है, लेकिन उसकी वृद्धि दर में मामूली कमी आई है। यह आंकड़ा उद्योगों की कमाई और उनके प्रदर्शन को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। एक तरफ मौजूदा फैक्ट्रियां मुनाफा कमा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ नई इकाइयों की स्थापना की गति धीमी पड़ रही है। ऐसे में औद्योगिक क्षेत्र में विस्तार की रफ्तार पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आने वाले समय में निवेश और मांग की स्थिति इस रुझान को प्रभावित कर सकती है।
रोजगार बढ़ा, लेकिन नई फैक्ट्रियों की रफ्तार कम
सर्वे के मुताबिक, औद्योगिक क्षेत्र में रोजगार की स्थिति में बढ़ोतरी हुई है। मौजूदा फैक्ट्रियों में कर्मचारियों की संख्या बढ़ने से कुल औद्योगिक रोजगार में इजाफा हुआ है। हालांकि, नई फैक्ट्रियों के निर्माण की रफ्तार कम रहने से नए रोजगार पैदा होने की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है। यानी रोजगार बढ़ रहा है, लेकिन इसमें मौजूदा औद्योगिक इकाइयों की भूमिका ज्यादा दिखाई दे रही है। ओडिशा, सिक्किम, झारखंड, छत्तीसगढ़ और गुजरात में प्रति कर्मचारी उत्पादन वृद्धि सबसे ज्यादा दर्ज की गई। इन राज्यों का प्रदर्शन इस मामले में कई बड़ी अर्थव्यवस्था वाले राज्यों से बेहतर रहा। इससे अलग-अलग राज्यों में औद्योगिक उत्पादकता के बीच अंतर भी सामने आता है।
ग्रामीण और शहरी मांग में कमी का असर
नई फैक्ट्रियों और उत्पादन क्षमता में धीमी वृद्धि के पीछे बाजार की मांग को भी एक अहम कारण माना जा रहा है। ग्रामीण भारत में वस्तुओं की मांग कमजोर होने की बात सामने आई है। वहीं, शहरी क्षेत्रों में महंगाई के दबाव के कारण लोगों की खरीदारी प्रभावित होने का अनुमान है। जब बाजार में मांग कमजोर होती है, तो कंपनियां नई उत्पादन इकाइयों में निवेश को लेकर सतर्क रुख अपना सकती हैं। इसका असर नई फैक्ट्रियों और मशीनरी में होने वाले निवेश पर पड़ सकता है। इसी वजह से औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि के बावजूद नई उत्पादन क्षमता जोड़ने की गति उतनी तेज नहीं दिख रही है। आने वाले समय में घरेलू मांग में सुधार नई औद्योगिक इकाइयों के निर्माण की रफ्तार के लिए अहम भूमिका निभा सकता है।