नई दिल्ली।मध्य प्रदेश के दतिया से कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को दिल्ली की विशेष MP-MLA कोर्ट ने फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) घोटाले के मामले में दोषी करार देते हुए तिहाड़ जेल भेज दिया है। कोर्ट ने उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी) के तहत दोषी पाया। करीब 25 साल पुराने घोटाले के इस मामले में कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती और बैंक कर्मचारी रघुवीर शरण प्रजापति को दोषी करार दिया है। अदालत ने दोनों को बैंक के साथ धोखाधड़ी, कूटरचना और आपराधिक षड्यंत्र का दोषी पाया है।
ये है पूरा मामला
दरअसल 24 अगस्त 1998 को राजेंद्र भारती की मां सावित्री श्याम ने जिला सहकारी ग्रामीण विकास बैंक, दतिया में 10 लाख रुपए की एफडी तीन वर्ष के लिए 13.50% वार्षिक ब्याज दर पर कराई थी। उस समय राजेंद्र भारती बैंक के संचालक मंडल के अध्यक्ष भी थे और श्याम सुंदर श्याम जनसहयोग एवं सामुदायिक विकास संस्थान से भी जुड़े हुए थे, जिससे दोनों संस्थाओं में उनका प्रत्यक्ष हित जुड़ा हुआ था। अभियोजन के मुताबिक, राजेंद्र भारती ने अपनी पदीय स्थिति और अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए बैंक कर्मचारी रघुवीर शरण प्रजापति के साथ मिलकर बैंक दस्तावेजों-लेजर बुक, एफडी स्लिप और रसीद-में काट-छांट कर एफडी की अवधि 3 वर्ष से बढ़ाकर 10 और फिर 15 वर्ष कर दी। इसका उद्देश्य 13.50% ब्याज दर का लाभ लंबे समय तक अपनी मां और संबंधित संस्था को दिलाना था। जांच में सामने आया कि इस हेराफेरी के जरिए वर्ष 1999 से 2011 तक प्रतिवर्ष लगभग 1.35 लाख रुपए का अनुचित लाभ लिया गया, जिससे बैंक को आर्थिक नुकसान हुआ। बाद में बैंक ऑडिट में अनियमितता उजागर हुई और संयुक्त पंजीयक सहकारी संस्थाओं के निर्देश पर 29 जुलाई 2015 को मामला न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। इस केस में अदालत ने राजेंद्र भारती के खिलाफ IPC की धारा 420, 467, 468, 471 और 120(बी) के तहत आरोप तय किए थे, जबकि सह-आरोपी रघुवीर शरण प्रजापति पर धारा 420, 467, 468, 471, 409 और 120(बी) के तहत मुकदमा चलाया गया। अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों को न्यायालय ने संदेह से परे प्रमाणित मानते हुए 1 अप्रैल 2026 को दोनों को दोषी करार दिया।
कल होगा सजा का ऐलान
दिल्ली की विशेष MP-MLA कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद अब इस बहुचर्चित मामले में सबसे अहम चरण सजा का है, जिस पर 2 अप्रैल को सुनवाई होगी। इस दौरान अदालत दोनों पक्षों-अभियोजन और बचाव-की दलीलों को सुनकर यह तय करेगी कि दोषियों को कितनी सजा दी जाए। अभियोजन पक्ष कोर्ट से कड़ी सजा की मांग कर सकता है, यह कहते हुए कि आरोपियों ने सुनियोजित तरीके से फर्जी और कूटरचित दस्तावेज तैयार कर बैंक को आर्थिक नुकसान पहुंचाया। वहीं बचाव पक्ष सजा में नरमी की अपील कर सकता है, जैसे कि आरोपी का सामाजिक और राजनीतिक रिकॉर्ड, लंबा समय बीत जाना (करीब 25 साल पुराना मामला) और अन्य परिस्थितियों को आधार बनाया जा सकता है।