मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार मामलों में कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि सिर्फ रिश्वत लेना ही अपराध नहीं है, बल्कि रिश्वत की मांग करना भी अपराध की श्रेणी में आता है। इसी टिप्पणी के साथ कोर्ट ने आरोपी ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर की एफआईआर रद्द करने की याचिका खारिज कर दी।
एफआईआर रद्द करने से हाईकोर्ट का इनकार
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में प्रथम दृष्टया अपराध के लक्षण मौजूद हैं, इसलिए इस स्तर पर एफआईआर को निरस्त नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जांच को आगे बढ़ाना आवश्यक है, ताकि वास्तविक तथ्य सामने आ सकें।
10 हजार रुपये मासिक रिश्वत मांगने का आरोप
मामला टीकमगढ़ जिले के बल्देवगढ़ में पदस्थ ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर डॉ. अंकित त्रिपाठी से जुड़ा है। आरोप है कि उन्होंने खड़गपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र परिसर में आधार कार्ड केंद्र संचालित करने के बदले हर माह 10 हजार रुपये रिश्वत की मांग की थी।
लोकायुक्त की शिकायत पर दर्ज हुई एफआईआर
आधार केंद्र संचालक ने इस मामले की शिकायत लोकायुक्त से की थी। शिकायत की जांच के बाद लोकायुक्त पुलिस ने संबंधित धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की।
याचिकाकर्ता को नहीं मिली राहत
आरोपी मेडिकल ऑफिसर ने लोकायुक्त द्वारा दर्ज एफआईआर को रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हालांकि कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि रिश्वत की मांग भी कानूनन अपराध है और इस मामले में सुनवाई के दौरान ही तथ्य तय किए जाएंगे।