भोपाल डेस्क. दीपावली की चमक हिंदी सिनेमा में शुरुआती दौर से ही दिखाई देती रही है। फिल्मों ने इस पर्व को केवल दीयों और आतिशबाजी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसके जरिए प्रेम, उल्लास, विरह और सामाजिक पीड़ा को भी स्वर दिया। दिवाली पर दूसरे त्योहारों की तुलना में भले ही कम गीत बने हों, लेकिन इनमें से कई आज भी सदाबहार हैं। इन गीतों की खासियत है कि ये रोशनी के बीच मन की खुशी के साथ उसकी उदासी को भी बयां करते हैं। यही वजह है कि हर साल दीपावली आते ही पुराने फिल्मी नगमे फिर गूंजने लगते हैं और त्योहार की यादों को संगीत से जोड़ देते हैं।
'दिया जलाओ जगमग जगमग' की अमिट चमक
दिवाली के शुरुआती चर्चित गीतों में 1941 की फिल्म 'खजांची' का शमशाद बेगम की आवाज में गाया 'आई दिवाली आई, कैसे उजाले लाई' शामिल है। 1944 की फिल्म 'रतन' में जोहराबाई अंबालेवाली ने 'आई दिवाली आई दिवाली, दीपक संग नाचे पतंगा, मैं किसके संग नाचूं बता जा' गाकर त्योहार के उल्लास को स्वर दिया। लेकिन के. एल. सहगल की आवाज में 1943 की फिल्म 'तानसेन' का 'दिया जलाओ जगमग जगमग' अपनी अलग पहचान बना गया। दीपक, चांद और रोशनी के प्रतीकों से सजा यह गीत आज भी दिवाली की संगीत परंपरा का अहम हिस्सा है। सहगल की आवाज और इसकी भावपूर्ण धुन ने इसे कालजयी बना दिया।
'एक वो भी दिवाली थी...' में छलका विरह
दीपावली खुशियों का पर्व है, लेकिन हिंदी फिल्मों ने इसके बीच छिपे दर्द को भी जगह दी। 1961 की फिल्म 'नजराना' में मुकेश का गाया 'एक वो भी दिवाली थी, एक ये भी दिवाली है' इसी पीड़ा का मार्मिक उदाहरण है। उजड़े गुलशन और रोते माली के रूपक के जरिए गीत बीते सुखद दिनों और वर्तमान की उदासी का अंतर दिखाता है। बाहर रोशनी है, लेकिन दिल में अंधेरा। संगीतकार रवि की भावपूर्ण धुन और मुकेश की दर्दभरी आवाज ने इस गीत को यादगार बना दिया। राज कपूर और वैजयंतीमाला पर फिल्माया गया यह नगमा आज भी त्योहार के बीच किसी अपने की कमी का एहसास कराता है।
जब गीतों में उभरी सामाजिक संवेदना
फिल्मी गीतों ने दिवाली की चमक के पीछे छिपी सामाजिक विषमता को भी उजागर किया। 1973 की फिल्म 'जुगनू' का गीत 'दीप दिवाली के झूठे, रात जले सुबह टूटे' अनाथ बच्चों की पीड़ा को सामने लाता है। धर्मेंद्र पर फिल्माया गया यह गीत त्योहार की रौनक और वंचित बच्चों के जीवन के बीच का अंतर दिखाता है। इसी तरह 1962 की फिल्म 'बीस साल बाद' का 'कहीं दीप जले कहीं दिल' सीधे दिवाली पर आधारित नहीं है, लेकिन इसके बोलों में दीपों की रोशनी के साथ मन की बेचैनी भी महसूस होती है। इन गीतों ने उत्सव को मानवीय संवेदनाओं से जोड़ दिया।
संघर्ष और उम्मीद के बीच दिवाली की रोशनी
1965 की फिल्म 'हकीकत' में लता मंगेशकर का गाया 'आई अब के साल दिवाली' त्योहार को प्रतीक्षा और भावनात्मक जुड़ाव से जोड़ता है। युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में दिवाली की याद घर-परिवार और अपनों के महत्व को रेखांकित करती है। वहीं फिल्म 'किस्मत' का 'घर-घर में दिवाली है' अभावों के बीच भी त्योहार मनाने की उम्मीद जगाता है। ये गीत बताते हैं कि दीपावली की खुशी केवल साधनों की मोहताज नहीं होती। मुश्किल हालात में भी उत्साह और उम्मीद का दीप जलाया जा सकता है।
सदाबहार नगमों में आज भी जीवित है दिवाली
बाद के वर्षों में भी हिंदी फिल्मों ने दिवाली के गीतों की परंपरा को आगे बढ़ाया। 'आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया' का 'आई है दिवाली सुनो जी घरवाली', 'होम डिलीवरी' का 'हैप्पी दिवाली' और 'शिरडी के साईं बाबा' का 'दीपावली मनाई सुहानी' त्योहार के उल्लास को स्वर देते हैं। दूसरी ओर 'हरियाली और रास्ता' का 'लाखों तारे आसमान में, एक मगर ढूंढे न मिला' और 'पैगाम' का 'कैसी दिवाली मनाएं लाला' उदासी और सामाजिक परिस्थितियों की झलक दिखाते हैं। यही विविधता इन गीतों को खास बनाती है। कोई इनमें प्रेम और खुशी तलाशता है, तो कोई बीते समय और बिछड़े अपनों की याद। इसीलिए फिल्मी दिवाली के ये नगमे हर पीढ़ी के साथ अपनी चमक बनाए हुए हैं।