5G Tower Radiation: देश में 5G नेटवर्क के बढ़ते इस्तेमाल के बीच मोबाइल टावरों से जुड़े इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड (EMF) नियमों में बदलाव की चर्चा तेज हो गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार 5G बेस स्टेशन के लिए तय पावर डेंसिटी की मौजूदा सीमा 5 वॉट प्रति वर्ग मीटर से बढ़ाकर 10 वॉट प्रति वर्ग मीटर करने की तैयारी कर रही है। इस बदलाव को लेकर जहां टेलीकॉम कंपनियां बेहतर नेटवर्क कवरेज और कम इंफ्रास्ट्रक्चर लागत की उम्मीद जता रही हैं, वहीं रेडिएशन और स्वास्थ्य को लेकर लोगों के मन में कई सवाल हैं।
सरकार क्यों बढ़ाना चाहती है 5G टावरों की सीमा?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, मौजूदा EMF सीमा के कारण टेलीकॉम कंपनियों को 5G नेटवर्क का कवरेज बढ़ाने में दिक्कत आ रही है। कंपनियों का कहना है कि ज्यादा पावर डेंसिटी की अनुमति मिलने से सिग्नल अधिक दूरी तक पहुंच सकेंगे। इससे ऑपरेटर कम टावरों के जरिए बड़े क्षेत्र में नेटवर्क उपलब्ध करा सकते हैं और नेटवर्क विस्तार की लागत भी कम हो सकती है। इस बदलाव का फायदा खास तौर पर उन कंपनियों को मिलने की उम्मीद है जो 5G नेटवर्क के विस्तार पर काम कर रही हैं।
भारत में अभी कितना है EMF नियम?
भारत ने लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मानकों की तुलना में अपेक्षाकृत सख्त EMF मानक अपनाए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत ने 2008 में ICNIRP की सिफारिशों को अपनाया था, लेकिन बाद में इन्हें और कड़ा किया गया। पावर डेंसिटी की सीमा पहले 1 वॉट प्रति वर्ग मीटर थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 5 वॉट प्रति वर्ग मीटर किया गया। अब इसे 10 वॉट प्रति वर्ग मीटर किए जाने की चर्चा है, जो ICNIRP की अनुशंसित सीमा के बराबर होगी।
दुनिया के कई देशों में 10 वॉट की सीमा
रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 137 देशों में 10 वॉट प्रति वर्ग मीटर की सीमा लागू है। इनमें यूरोपीय संघ के कई देश, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर शामिल हैं। ICNIRP गैर-आयोनाइजिंग रेडिएशन से जुड़े वैज्ञानिक सुरक्षा मानकों के लिए प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में से एक है।
क्या 5G रेडिएशन से सेहत को खतरा है?
EMF सीमा बढ़ाने की चर्चा के साथ स्वास्थ्य को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। मोबाइल टावर रेडियोफ्रीक्वेंसी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड उत्सर्जित करते हैं, लेकिन ये गैर-आयोनाइजिंग रेडिएशन होते हैं। WHO, ICNIRP और अन्य प्रमुख वैज्ञानिक संस्थाओं के अनुसार, निर्धारित सुरक्षा सीमाओं के भीतर रेडियोफ्रीक्वेंसी एक्सपोजर से जनस्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव का ठोस प्रमाण स्थापित नहीं हुआ है। 5G को लेकर भी ICNIRP ने अपनी सुरक्षा गाइडलाइंस में कहा है कि निर्धारित एक्सपोजर सीमा का पालन किए जाने पर तकनीक को सुरक्षित माना जाता है।
कैंसर को लेकर क्या है वैज्ञानिक स्थिति?
मोबाइल टावरों से कैंसर का खतरा बढ़ने जैसे दावे समय-समय पर सामने आते रहे हैं। हालांकि, उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर मोबाइल टावरों से होने वाले सामान्य स्तर के एक्सपोजर और कैंसर के बीच सीधा कारणात्मक संबंध स्थापित नहीं हुआ है। यही वजह है कि विशेषज्ञों का मुख्य जोर तय सुरक्षा सीमाओं का पालन और नियमित निगरानी पर रहता है।
कुछ वैज्ञानिक क्यों जताते हैं चिंता?
कुछ स्वतंत्र शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों का तर्क है कि मौजूदा सुरक्षा मानक मुख्य रूप से रेडिएशन से होने वाली तापीय वृद्धि (thermal effects) को ध्यान में रखते हैं। उनका कहना है कि लंबे समय तक कम स्तर के एक्सपोजर के संभावित गैर-तापीय प्रभावों पर अभी भी शोध जारी है। इसी कारण कुछ विशेषज्ञ घनी आबादी, स्कूल और अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थानों के आसपास अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। हालांकि, यह अलग बात है कि मौजूदा निर्धारित सुरक्षा सीमाओं के भीतर सामान्य सार्वजनिक एक्सपोजर से नुकसान के दावे को समर्थन देने वाले प्रमाण अभी निर्णायक नहीं हैं।
नए नियम के बाद भी होगी निगरानी
EMF सीमा में बदलाव होने के बावजूद टेलीकॉम ऑपरेटरों को निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन करना होगा। दूरसंचार विभाग मोबाइल बेस स्टेशनों से रेडियोफ्रीक्वेंसी उत्सर्जन की सीमा और उसके अनुपालन की निगरानी करता है। टावर ऑपरेटरों को यह प्रमाणित करना होगा कि अधिकतम ट्रैफिक की स्थिति में भी टावर के आसपास सार्वजनिक क्षेत्र में EMF एक्सपोजर निर्धारित सुरक्षित सीमा के भीतर है।
आखिर क्या बदलेगा?
अगर प्रस्तावित बदलाव लागू होता है, तो 5G बेस स्टेशनों के लिए अनुमत पावर डेंसिटी 5 से बढ़कर 10 वॉट प्रति वर्ग मीटर हो सकती है। इससे नेटवर्क कवरेज और टावर इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत पर असर पड़ सकता है। हालांकि, इसे सीधे तौर पर यह कहना सही नहीं होगा कि “लोगों के शरीर पर रेडिएशन दोगुना हो जाएगा”। पावर डेंसिटी की नियामकीय सीमा बढ़ना और किसी व्यक्ति का वास्तविक रेडिएशन एक्सपोजर एक ही बात नहीं है। वास्तविक एक्सपोजर टावर की दूरी, एंटीना की दिशा, नेटवर्क ट्रैफिक और कई अन्य कारकों पर निर्भर करता है।