नई दिल्ली: भारत में बच्चों में बढ़ते मधुमेह (डायबिटीज) के संकट को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने हाल ही में आयोजित 'नेशनल समिट ऑन बेस्ट प्रैक्टिसेज इन पब्लिक हेल्थकेयर' में "गाइडेंस डॉक्युमेंट ऑन डायबिटीज मेलिटस इन चिल्ड्रन" (बच्चों में मधुमेह पर मार्गदर्शन दस्तावेज) जारी किया है। यह देश में पहली बार है जब बच्चों में मधुमेह की देखभाल को पूरी तरह से सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली (Public Health System) में एकीकृत किया गया है।
डायबिटीज का बढ़ता संकट और मुफ्त इलाज का वादा
भारत को अक्सर 'दुनिया की डायबिटीज राजधानी' कहा जाता है, जहाँ 10 करोड़ से अधिक वयस्क इससे पीड़ित हैं। लेकिन अब बच्चों में भी टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इन दिशा-निर्देशों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अब सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर पीड़ित बच्चों को मुफ्त पैकेज मिलेगा, जिसमें शामिल हैं:
सभी जरूरी डायग्नोस्टिक टेस्ट।
जीवन भर के लिए इंसुलिन थेरेपी।
ग्लूकोमीटर और टेस्ट स्ट्रिप्स।
नियमित फॉलो-अप और उपचार।
यूनिवर्सल स्क्रीनिंग और "4Ts" का मंत्र
सरकार ने जन्म से लेकर 18 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए यूनिवर्सल स्क्रीनिंग का लक्ष्य रखा है। यह स्क्रीनिंग स्कूलों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से की जाएगी। शुरुआती पहचान के लिए मंत्रालय ने "4Ts" के लक्षणों के प्रति जागरूक रहने की सलाह दी है:
1. Toilet (टॉयलेट): बार-बार पेशाब आना।
2. Thirsty (थर्स्टी): अत्यधिक प्यास लगना।
3. Tired (टायर्ड): लगातार थकान महसूस होना।
4. Thinner (थिनर): अचानक वजन कम होना।
एक मजबूत स्वास्थ्य ढांचा
नए दिशानिर्देशों के तहत, सामुदायिक स्तर पर स्क्रीनिंग से लेकर जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों तक एक निर्बाध नेटवर्क तैयार किया गया है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि बच्चों को लंबे समय तक बिना किसी रुकावट के इलाज मिले। इसके साथ ही, परिवारों और देखभाल करने वालों को इंसुलिन के उपयोग और आपातकालीन देखभाल का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।
इस ऐतिहासिक कदम से न केवल गरीब परिवारों पर आर्थिक बोझ कम होगा, बल्कि उचित प्रबंधन के माध्यम से बच्चों में किडनी फेलियर और आंखों की रोशनी जाने जैसी गंभीर जटिलताओं और असमय होने वाली मौतों को भी रोका जा सकेगा।