भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की ताजा चेतावनी ने मानसून को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। प्रशांत महासागर में सक्रिय हो रहे अल नीनो के कारण जून से सितंबर तक सामान्य से कम वर्षा होने की आशंका जताई गई है। मौसम विभाग ने इस बार मानसून को लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) के लगभग 90 प्रतिशत स्तर पर रहने का अनुमान व्यक्त किया है। इसके साथ ही मानसून सीजन की शुरुआती अवधि में वर्षा में दर्ज की गई कमी ने कृषि क्षेत्र, बाजार और नीति निर्माताओं का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। ऐसे संकेत उस समय सामने आए हैं जब देश पहले ही भीषण गर्मी और हीटवेव की चुनौती से जूझ चुका है।
कृषि क्षेत्र के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह चेतावनी
हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का योगदान अब पहले की तुलना में कम होकर लगभग 14 से 16 प्रतिशत के बीच रह गया है, लेकिन इसका सामाजिक और आर्थिक महत्व आज भी अत्यंत बड़ा है। पीएलएफएस के आंकड़ों के अनुसार देश का लगभग 46 प्रतिशत कार्यबल प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। ऐसे में यदि मानसून कमजोर रहता है तो इसका असर केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि करोड़ों ग्रामीण परिवारों की आय, रोजगार और उपभोग क्षमता पर भी पड़ सकता है। यही कारण है कि मानसून को आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा माना जाता है।
महंगाई पर पड़ सकता है सीधा असर
कमजोर मानसून का सबसे तेज प्रभाव खाद्य महंगाई के रूप में देखने को मिल सकता है। भारत के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी लगभग 37 प्रतिशत है। यदि वर्षा की कमी के कारण अनाज, दाल, फल और सब्जियों का उत्पादन प्रभावित होता है तो बाजार में आपूर्ति घट सकती है, जिससे कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव बनेगा। खाद्य महंगाई बढ़ने की स्थिति में आम उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति प्रभावित हो सकती है और भारतीय रिजर्व बैंक के लिए मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
बदली है ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर
विशेषज्ञों का मानना है कि आज की भारतीय अर्थव्यवस्था पहले की तुलना में अल नीनो जैसी परिस्थितियों का सामना करने में कहीं अधिक सक्षम है। पिछले एक दशक में ग्रामीण क्षेत्रों में कई संरचनात्मक बदलाव हुए हैं। सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, फसलों का विविधीकरण, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की व्यवस्था, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) योजनाएं तथा गैर-कृषि आय के अवसरों ने किसानों और ग्रामीण परिवारों की निर्भरता केवल मानसून पर कम की है। यही वजह है कि कमजोर बारिश का प्रभाव अब पहले जैसा व्यापक और गहरा नहीं माना जा रहा।
सिंचाई नेटवर्क बना बड़ी ताकत
इकोनॉमिक सर्वे 2024-25 के अनुसार भारत के कुल बुआई क्षेत्र का लगभग 55 प्रतिशत हिस्सा अब सिंचाई सुविधाओं के दायरे में आ चुका है। एक दशक पहले यह आंकड़ा करीब 49.3 प्रतिशत था। इस बदलाव का अर्थ यह है कि देश की आधे से अधिक कृषि भूमि अब केवल प्राकृतिक वर्षा पर निर्भर नहीं है। नहरों, ट्यूबवेल, ड्रिप इरिगेशन और माइक्रो इरिगेशन जैसी व्यवस्थाओं ने कृषि उत्पादन को अधिक स्थिर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यही कारण है कि मानसून की कमी का सीधा प्रभाव अब सीमित क्षेत्रों तक सिमट सकता है।
सरकार और बाजार के पास हैं सुरक्षा कवच
भारतीय अर्थव्यवस्था ने पिछले वर्षों में खाद्य सुरक्षा और कृषि स्थिरता के लिए कई सुरक्षा तंत्र विकसित किए हैं। सरकार के पास गेहूं और चावल जैसे प्रमुख खाद्यान्नों का पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद रहता है, जिसका उपयोग आपूर्ति संकट की स्थिति में किया जा सकता है। इसके अलावा किसानों के लिए एमएसपी व्यवस्था, फसल बीमा योजनाएं और विभिन्न कल्याणकारी कार्यक्रम भी जोखिम को कम करने में मदद करते हैं। ये सभी उपाय आर्थिक झटकों को अवशोषित करने वाले मजबूत तंत्र के रूप में काम करते हैं।
चुनौती बड़ी, लेकिन अर्थव्यवस्था पहले से अधिक मजबूत
अल नीनो निश्चित रूप से भारतीय कृषि और खाद्य कीमतों के लिए चिंता का विषय है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में इसका असर अतीत की तुलना में सीमित रहने की संभावना है। मजबूत सिंचाई ढांचा, बेहतर सरकारी हस्तक्षेप, खाद्यान्न भंडार और ग्रामीण आय के विविध स्रोत भारतीय अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त मजबूती प्रदान कर रहे हैं। फिर भी आने वाले महीनों में मानसून की प्रगति पर नजर बनाए रखना जरूरी होगा, क्योंकि कृषि उत्पादन, महंगाई और ग्रामीण मांग की दिशा काफी हद तक बारिश के प्रदर्शन पर निर्भर करेगी।