मध्यप्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण से जुड़े बहुचर्चित मामले में बुधवार को एक महत्वपूर्ण कानूनी पड़ाव पूरा हो गया। हाई कोर्ट की विशेष युगलपीठ ने सभी पक्षों की अंतिम दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब इस बहुप्रतीक्षित मामले में न्यायालय आने वाले दिनों में अपना निर्णय सुनाएगा, जिसका असर प्रदेश में सरकारी भर्तियों और हजारों अभ्यर्थियों के भविष्य पर पड़ सकता है।
ढाई घंटे से अधिक चली अंतिम सुनवाई
मामले की सुनवाई प्रशासनिक न्यायाधीश न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति विनय सराफ की विशेष युगलपीठ के समक्ष हुई। करीब ढाई घंटे से अधिक समय तक चली सुनवाई में सरकार, ओबीसी पक्ष और अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से विस्तृत कानूनी तर्क रखे गए।
सुनवाई के दौरान आरक्षण की संवैधानिक वैधता, कुल आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा, ओबीसी वर्ग की वास्तविक आबादी, सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आंकड़े, क्रीमी लेयर और नियुक्तियों में आरक्षण लागू करने जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से बहस हुई।
न्यायालय ने सभी पक्षों की दलीलें सुनीं
अंतिम बहस पूरी होने के बाद न्यायमूर्ति आनंद पाठक ने सभी अधिवक्ताओं का धन्यवाद करते हुए कहा कि इस मामले की सुनवाई न्यायालय के लिए भी एक महत्वपूर्ण सीख रही। उन्होंने कहा कि सभी पक्षों ने संवैधानिक प्रावधानों, सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों के फैसलों के साथ-साथ उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर अपने-अपने तर्क प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किए।लंबे समय तक चली इस सुनवाई के दौरान अदालत के सामने आरक्षण व्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण कानूनी और संवैधानिक पहलुओं पर गहन चर्चा हुई।
2019 से न्यायालय में लंबित है मामला
गौरतलब है कि वर्ष 2019 में मध्य प्रदेश सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का निर्णय लिया था। इसके बाद इस फैसले को विभिन्न याचिकाओं के माध्यम से हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
तब से यह मामला न्यायिक विचाराधीन है और इसी कारण प्रदेश की कई सरकारी भर्तियां भी प्रभावित हुई हैं। अनेक नियुक्तियां या तो रुकी हुई हैं या फिर अंतरिम आदेशों के तहत की गई हैं।
ओबीसी पक्ष ने रखा अपना पक्ष
सुनवाई के दौरान ओबीसी पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने अंतिम दलीलें प्रस्तुत कीं। उन्होंने अदालत को बताया कि तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2019 में दाखिल किए गए विस्तृत जवाब में ओबीसी वर्ग की आबादी लगभग 51 प्रतिशत बताई गई थी।
हजारों अभ्यर्थियों की निगाह फैसले पर
प्रदेश में लंबे समय से चल रही विभिन्न भर्ती प्रक्रियाओं से जुड़े हजारों उम्मीदवार इस फैसले का इंतजार कर रहे हैं। हाई कोर्ट का निर्णय आने के बाद कई लंबित भर्तियों और नियुक्तियों का रास्ता साफ हो सकता है या फिर आरक्षण व्यवस्था को लेकर नई कानूनी स्थिति सामने आ सकती है।
सरकार, अभ्यर्थियों, कर्मचारी संगठनों और विभिन्न सामाजिक संगठनों की नजर अब हाई कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हुई है। माना जा रहा है कि यह निर्णय मध्य प्रदेश की आरक्षण नीति और भविष्य की भर्ती प्रक्रियाओं के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा।