नई दिल्ली. ब्रिक्स समेत कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन लगातार मैत्री और सहयोग की भाषा बोलता रहा है। शी जिनपिंग के भारत दौरे और उच्च स्तरीय बैठकों के बावजूद सीमा पर तनाव की खबरें चिंता पैदा करती हैं। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति बनाए रखने के दावों और जमीनी हकीकत के बीच स्पष्ट अंतर दिख रहा है। भारत बार-बार कह चुका है कि सीमा की स्थिरता ही द्विपक्षीय संबंधों का आधार है। फिर भी गश्त पैटर्न से हटकर गतिविधियां होने पर स्थिति बिगड़ जाती है। यह दोहरा रुख लंबे समय से दोनों देशों के संबंधों पर छाया डालता आया है। कूटनीतिक मुस्कान और सैन्य सतर्कता का यह मेल अब नया नहीं रह गया है।
अरुणाचल में आमना-सामना और आधिकारिक पुष्टि
भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने स्पष्ट कहा कि पिछले कुछ समय से अरुणाचल प्रदेश में आईटीबीपी के जवान और पीएलए के सैनिक आमने-सामने आए हैं। यह स्थिति अभी तक पूरी तरह नहीं बदली है। सुबनसिरी जिले के असाफिला और माजा इलाके में तनाव बना हुआ बताया जा रहा है। जुलाई से शुरू हुए इस तनाव की आधिकारिक पुष्टि पहली बार हुई है। तीन उच्च स्तरीय बैठकों के बावजूद समस्या जस की तस बनी हुई है। सीमा पर ऐसी घटनाएं विश्वास बहाली की प्रक्रिया को कमजोर करती हैं। आधिकारिक बयान ने अब इस मुद्दे को सार्वजनिक चर्चा का केंद्र बना दिया है।
विपक्ष के सवाल और सरकार का रुख
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर चुप्पी और देरी से जानकारी साझा करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि जुलाई से चले आ रहे तनाव को देश से छिपाया गया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा से जुड़े विवादों को सुलझाने के प्रयासों में लगे हैं। बेहतर रिश्ते सीमा की शांति पर ही निर्भर करते हैं। विपक्ष सरकार की कूटनीतिक सक्रियता पर सवाल उठा रहा है जबकि सरकार बातचीत और संयम का मार्ग अपनाने पर जोर दे रही है। यह राजनीतिक बहस सुरक्षा चिंताओं को और रेखांकित करती है। पारदर्शिता की मांग अब और तेज हो गई है।
गलवान की याद और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
1962 के युद्ध और 2020 के गलवान संघर्ष की यादें अभी भी ताजा हैं। गलवान में बीस भारतीय जवानों के बलिदान ने पूरे देश को झकझोर दिया था। चीन की नीति को लेकर भारतीयों के मन में संदेह बना हुआ है। मुंह में राम और बगल में छुरी वाली कहावत को कई विश्लेषक चीन के व्यवहार पर लागू करते हैं। अरुणाचल को दक्षिण तिब्बत कहने की उसकी आदत संप्रभुता के प्रति उसके रवैये को दर्शाती है। ऐतिहासिक अनुभवों ने भारत को सीमा सुरक्षा के मामले में सतर्क रहने की सीख दी है। भूत की घटनाएं वर्तमान तैयारियों को दिशा देती रहती हैं।
आईटीबीपी की तैयारियां और आधुनिकीकरण
आईटीबीपी महानिदेशक ने बताया कि नई शौर्य कमांडो टीमों ने तनाव के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पारंपरिक तरीकों से चीन का मुकाबला मुश्किल होता जा रहा है क्योंकि उसने बुनियादी ढांचे और हथियारों में भारी निवेश किया है। आधुनिक युद्धों में ड्रोन जैसी तकनीक निर्णायक साबित हो रही है। आईटीबीपी ने चार हजार करोड़ रुपये के आधुनिकीकरण बजट में से एक हजार करोड़ ड्रोन क्षमता बढ़ाने पर लगाने का निर्णय लिया है। एंटी ड्रोन सिस्टम ड्रोन प्लाटून और भूमिगत आश्रय स्थलों पर जोर दिया जा रहा है। भविष्य के संघर्षों से निपटने के लिए ये कदम जरूरी माने जा रहे हैं। तकनीक आधारित सुरक्षा अब अपरिहार्य हो चुकी है।
आगे की चुनौतियां और संयम की जरूरत
सीमा पर शांति बनाए रखना दोनों देशों के दीर्घकालिक हित में है। सैन्य स्तर की बातचीत और कूटनीतिक संवाद जारी रहना चाहिए। साथ ही जमीनी तैयारियों को मजबूत करना भी उतना ही आवश्यक है। ड्रोन युद्ध भूमिगत संरचनाएं और रैपिड रिस्पॉन्स क्षमताएं अब सुरक्षा सिद्धांत का हिस्सा बन चुकी हैं। भारत को अपनी संप्रभुता की रक्षा करते हुए संवाद का दरवाजा खुला रखना होगा। केवल सतर्कता और आधुनिक क्षमताओं के बल पर ही भविष्य में गलवान जैसी स्थितियों से बचा जा सकता है। सीमा की स्थिरता ही असली मैत्री की कसौटी है। दीर्घकालिक शांति के लिए निरंतर प्रयास ही एकमात्र रास्ता है।