अमेरिका और इज़रायल द्वारा चलाया गया सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ अब वैश्विक चर्चा का विषय बन गया है। इस अभियान के तहत ईरान के सैन्य ढांचे, मिसाइल कार्यक्रम और नौसैनिक प्रतिष्ठानों पर बड़े पैमाने पर हमले किए गए। इसी अभियान के दौरान सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के कार्यालय के पास हुए हमले में उनकी मौत की खबर सामने आई, जिसने पूरे क्षेत्र में तनाव को चरम पर पहुँचा दिया। इस सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान और अमेरिका–इज़रायल के बीच खुले संघर्ष जैसे हालात पैदा हो गए हैं।
कैसे शुरू हुआ ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’
यह अभियान 28 फरवरी की रात शुरू किया गया। अमेरिकी रक्षा विभाग के अधिकारियों ने इसकी सार्वजनिक घोषणा भी तुरंत कर दी थी। प्रारंभिक हमले ईरान के मिसाइल कार्यक्रम से जुड़े ठिकानों पर किए गए, जिसके बाद नौसैनिक अड्डों, सैन्य कमांड केंद्रों और महत्वपूर्ण सैन्य प्रतिष्ठानों को भी निशाना बनाया गया। इस पूरे ऑपरेशन में इज़रायल की खुफिया और तकनीकी सहायता को निर्णायक माना गया।
अभियान का रणनीतिक उद्देश्य
अमेरिका का दावा है कि यह अभियान उसके नागरिकों और सहयोगी देशों के सैन्य कर्मियों पर संभावित खतरों को समाप्त करने के लिए शुरू किया गया। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार ईरान का मिसाइल विकास, ड्रोन क्षमता और सैन्य ढांचा पूरे मध्य–पूर्व में अस्थिरता बढ़ा रहा था। साथ ही अमेरिका ने यह भी संकेत दिया कि ईरान की बढ़ती परमाणु गतिविधियों पर कड़ा संदेश देना आवश्यक हो गया था।
किन सैन्य ठिकानों को बनाया गया निशाना
‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के तहत ईरान भर में फैले रणनीतिक ठिकानों पर संयुक्त हमला किया गया। मिसाइल निर्माण इकाइयाँ, नौसैनिक अड्डे, युद्धक कमांड सेंटर और सैन्य नियंत्रण इकाइयाँ इस अभियान के मुख्य लक्ष्य थे। हमले इतने व्यापक थे कि कुछ ही घंटों में ईरान की कई महत्वपूर्ण सैन्य संरचनाएँ प्रभावित हो गईं। इस दौरान इंटरनेट पर साझा किए गए एक संदेश में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा कि इस अभियान का उद्देश्य मध्य–पूर्व में अमेरिकी सेना और उसके सहयोगियों पर मंडराते खतरों को समाप्त करना था।
ईरान की जवाबी कार्रवाई और बढ़ता संकट
ईरान ने इस अभियान का जवाब बेहद आक्रामक तरीके से दिया। अयातुल्ला खामेनेई की मृत्यु के बाद देश में चालीस दिनों के शोक का ऐलान किया गया, लेकिन साथ ही ईरान ने सात देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन से हमले किए। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स और ईरानी सेना ने समन्वित जवाब देते हुए क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ढांचे को निशाना बनाया।
पड़ोसी देशों पर हमले और बढ़ता क्षेत्रीय तनाव
ईरान की जवाबी कार्रवाई केवल अमेरिकी ठिकानों तक सीमित नहीं रही। उसने संयुक्त अरब अमीरात और कतर पर भी बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन से हमले किए। ईरान ने संकेत दिया कि यदि कोई भी देश अमेरिका का समर्थन करता है, तो उसे भी इसकी कीमत चुकानी होगी। यह संदेश स्पष्ट था कि मध्य–पूर्व का पूरा क्षेत्र आने वाले दिनों में गंभीर अस्थिरता से गुजर सकता है।
आगे क्या हो सकता है
यह पूरा घटनाक्रम मध्य–पूर्व को युद्ध की कगार पर ले आया है। ऊर्जा, व्यापार, आवागमन और वैश्विक बाजारों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ इस तनाव को बेहद चिंता के साथ देख रही हैं। अब सबकी नज़रें इस पर टिकी हैं कि अमेरिका, ईरान और उनके सहयोगी देश इस स्थिति को युद्ध में बदलने से रोक पाते हैं या नहीं।
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