भोपाल डेस्क. ग्रीन पटाखे ऐसे आतिशबाजी उत्पाद हैं, जिन्हें पारंपरिक पटाखों की तुलना में प्रदूषणकारी उत्सर्जन कम करने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। इनकी रासायनिक संरचना में बदलाव किए जाते हैं, ताकि जलने के दौरान निकलने वाले धुएं और हानिकारक कणों की मात्रा घटाई जा सके। वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के अंतर्गत राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) ने इनके लिए मानक और तकनीकी मानदंड विकसित किए हैं। ग्रीन पटाखों की प्रमुख श्रेणियों में स्वास यानी सेफ वाटर रिलीजर, स्टार यानी सेफ थर्माइट क्रैकर और सफल यानी सेफ मिनिमल एल्युमिनियम शामिल हैं। इनकी संरचना में कुछ प्रदूषणकारी रसायनों के इस्तेमाल को सीमित या प्रतिबंधित किया गया है और बेरियम नाइट्रेट के उपयोग पर रोक है।
कितना कम प्रदूषण फैलाते हैं ग्रीन पटाखे?
नीरी के मानकों के अनुसार, ग्रीन पटाखों को संबंधित पारंपरिक पटाखों की तुलना में पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) का उत्सर्जन कम से कम 30 प्रतिशत घटाने की शर्त पूरी करनी होती है। एक अन्य निर्धारित विकल्प के तहत पीएम उत्सर्जन में कम से कम 20 प्रतिशत और सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ2) तथा नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ2) के उत्सर्जन में कम से कम 10 प्रतिशत की कमी अपेक्षित है। हालांकि, अलग-अलग उत्पादों का प्रदर्शन उनकी संरचना और निर्माण गुणवत्ता के आधार पर अलग हो सकता है। एक अध्ययन में कुछ ग्रीन पटाखों से निकलने वाले पीएम10 और पीएम2.5 में बेरियम की मात्रा पारंपरिक पटाखों के मुकाबले 30 से 60 प्रतिशत तक कम पाई गई। लेकिन किसी पटाखे से उत्सर्जन में कमी का अर्थ यह नहीं है कि उसके बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से पूरे शहर का प्रदूषण भी उसी अनुपात में घट जाएगा।
क्या ग्रीन पटाखे पूरी तरह प्रदूषण मुक्त हैं?
इसका जवाब है—नहीं। ग्रीन पटाखे भी जलने के बाद हवा में सूक्ष्म कण और विभिन्न गैसें छोड़ते हैं। दिल्ली में किए गए एक अध्ययन में इनके इस्तेमाल के दौरान अल्ट्राफाइन कणों की मौजूदगी दर्ज की गई थी। इन कणों का आकार, रासायनिक संरचना और हवा में उनकी मात्रा स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को प्रभावित करती है। इसलिए ग्रीन पटाखों को पारंपरिक आतिशबाजी के मुकाबले कम प्रदूषणकारी विकल्प तो माना जा सकता है, लेकिन इन्हें पर्यावरण के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं कहा जा सकता। इनके इस्तेमाल से ध्वनि प्रदूषण और आग लगने या जलने जैसी दुर्घटनाओं का खतरा भी बना रहता है। ऐसे में केवल ग्रीन नाम या कम उत्सर्जन के दावे के आधार पर इन्हें नुकसानरहित समझना उचित नहीं होगा।
बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से बढ़ सकता है पीएम2.5 और पीएम10
दिवाली के दौरान कम समय में बड़ी संख्या में पटाखे जलाए जाते हैं। ऐसे में अपेक्षाकृत कम उत्सर्जन वाले पटाखों के इस्तेमाल के बावजूद हवा में पीएम2.5 और पीएम10 जैसे कणों की मात्रा बढ़ सकती है। पीएम2.5 के कण इतने छोटे होते हैं कि सांस के साथ फेफड़ों के भीतर तक पहुंच सकते हैं, जबकि पीएम10 में 10 माइक्रोमीटर या इससे छोटे कण शामिल होते हैं। अमृतसर में दिवाली 2022 के दौरान पीएम2.5 का स्तर 182 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया था, जो भारत के 24 घंटे के निर्धारित मानक 60 माइक्रोग्राम से लगभग 3 गुना था। एक अन्य अध्ययन में दिवाली के दौरान आतिशबाजी के समय दिल्ली में पीएम2.5 का स्तर सामान्य समय की तुलना में लगभग 16 गुना तक बढ़ने की बात सामने आई थी। हालांकि, ये अध्ययन त्योहार के दौरान आतिशबाजी से जुड़े प्रदूषण को दर्शाते हैं, न कि केवल प्रमाणित ग्रीन पटाखों के प्रभाव को।
स्वास्थ्य के लिए कितने नुकसानदेह हो सकते हैं ग्रीन पटाखे?
ग्रीन पटाखों से प्रदूषण अपेक्षाकृत कम हो सकता है, लेकिन इनके धुएं और महीन कणों के कारण स्वास्थ्य संबंधी जोखिम पूरी तरह समाप्त नहीं होते। इनसे निकलने वाले कण सांस के जरिए शरीर में पहुंचकर श्वसन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं और पहले से मौजूद अस्थमा या हृदय संबंधी समस्याओं को बढ़ा सकते हैं। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और सांस या दिल की बीमारी से पीड़ित लोगों को इनके धुएं से विशेष रूप से बचना चाहिए। आईआईटी गुवाहाटी के 2015 के एक अध्ययन में दिवाली के दौरान पीएम10 का स्तर 311 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया था, जो सामान्य स्तर से 81 प्रतिशत अधिक था। अध्ययन में आतिशबाजी के दौरान सांस संबंधी शिकायतों के कारण अस्पताल पहुंचने वाले और भर्ती किए जाने वाले मरीजों के मामलों में भी बढ़ोतरी देखी गई थी। ये निष्कर्ष बताते हैं कि कम उत्सर्जन का दावा स्वास्थ्य जोखिम खत्म होने की गारंटी नहीं देता।
खरीदने और जलाने से पहले इन सावधानियों का रखें ध्यान
ग्रीन पटाखे खरीदते समय केवल दुकानदार के दावे पर भरोसा न करें, बल्कि उत्पाद की प्रमाणिकता और उस पर दी गई जानकारी की जांच करें। अधिकृत और विश्वसनीय विक्रेता से ही पटाखे खरीदें तथा पैकेट पर आवश्यक प्रमाणन और पहचान संबंधी विवरण देखें। आतिशबाजी हमेशा खुले और सुरक्षित स्थान पर करें तथा ज्वलनशील वस्तुओं, वाहनों और भीड़ से पर्याप्त दूरी बनाए रखें। पटाखे जलाते समय पानी या रेत की व्यवस्था रखें और बच्चों को कभी भी अकेले आतिशबाजी न करने दें। पटाखे हाथ में पकड़कर न जलाएं और यदि कोई पटाखा नहीं फूटता है तो उसके पास तुरंत न जाएं और दोबारा जलाने की कोशिश न करें। स्थानीय प्रशासन की ओर से तय समय, स्थान और ध्वनि संबंधी नियमों का पालन भी जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ग्रीन पटाखों को कम प्रदूषण वाला विकल्प समझें, पूरी तरह सुरक्षित विकल्प नहीं।