भोपाल: अनाज के बोरे, रजाई-गद्दे, खाना पकाने के बर्तन और हफ्ते भर का राशन साथ लेकर निकले करीब 2,000 किसानों ने मंगलवार को भारी पुलिस बैरिकेडिंग तोड़कर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की बाहरी सीमा में प्रवेश कर लिया। संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) के बैनर तले 19 किसान संगठनों के इस 'भोपाल कूच' ने मुख्यमंत्री मोहन यादव सरकार के सामने इस साल का सबसे बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक संकट खड़ा कर दिया है।किसानों का स्पष्ट कहना है कि जब तक सरकार राज्य में पैदा होने वाली मूंग की पूरी फसल (100%) की एमएसपी पर खरीद और खाद वितरण से जुड़ी समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं करती, वे वापस नहीं लौटेंगे।
सीमाओं पर भारी पुलिस बल तैनात, रात में तोड़े बैरिकेड्स
मंगलवार रात किसान काफिला भोपाल के बाहरी जिलों तक पहुंच गया। प्रशासन ने उन्हें रोकने के लिए सड़कों पर बहुस्तरीय (मल्टी-लेयर) बैरिकेड्स लगाए थे और भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया था। हालांकि, किसानों के उग्र रुख और दबाव के आगे पुलिस को पीछे हटना पड़ा और किसान शहर की सीमाओं में दाखिल होने में सफल रहे।
मूंग पर MSP की कैपिंग बनी विरोध की मुख्य वजह
किसान संगठनों के आक्रोश की मुख्य वजह मूंग फसल की सरकारी खरीद में लगाई गई सीमा है। किसान नेताओं का कहना है कि केंद्र सरकार ने तुअर, उड़द और मसूर की 100% एमएसपी खरीद की घोषणा की है, लेकिन मूंग को प्राइस सपोर्ट स्कीम (PSS) के तहत ही रखा गया है, जिसके जरिए राज्य के कुल उत्पादन का महज 25% ही खरीदा जाता है।इस कैपिंग के कारण किसानों को अपनी बाकी 75% उपज खुले बाजार में कौड़ियों के भाव बेचनी पड़ रही है। जबकि 2026-27 सीजन के लिए मूंग का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) ₹8,768 प्रति क्विंटल तय किया गया है।किसान नेता संतोष पटवारी ने कहा, “हम पिछले 20 दिनों से लामबंद हो रहे हैं। सरकार को कई ज्ञापन दिए गए, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। किसानों को मूंग का लाभकारी मूल्य नहीं मिल रहा है। हमारे पास मुख्यमंत्री आवास का घेराव करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था।”
नर्मदापुरम के सेठानी घाट से शुरू हुआ था सफर
आंदोलन की शुरुआत नर्मदापुरम से हुई, जहां किसान पहले सेठानी घाट पर एकत्र हुए और भोपाल की ओर बढ़ना शुरू किया। शुरुआत में प्रशासन ने उन्हें रोका, जिसके बाद किसानों ने धरना दिया। शाम होते-होते स्थिति तनावपूर्ण होने पर प्रशासन ने बैरिकेड्स हटाए। इसके बाद काफिला ओबेदुल्लागंज और रायसेन जिले से होते हुए भोपाल की ओर बढ़ा।प्रशासन ने मंडीदीप बॉर्डर और टोल प्लाजा पर फिर से बैरिकेड्स लगाए और किसान नेताओं को ज्ञापन देकर वापस लौटने की समझाइश दी, जिसे किसानों ने ठुकरा दिया।
ग्रामीण मध्य प्रदेश में गहराता असंतोष
यह आंदोलन केवल मूंग खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण मध्य प्रदेश में पनप रहे व्यापक असंतोष को भी दर्शाता है। किसान संगठनों का आरोप है कि फसल खरीद में देरी, मात्रा सीमा, रजिस्ट्रेशन में गड़बड़ी और बार-बार होने वाला खाद संकट हर सीजन की कहानी बन चुका है। खेती की बढ़ती लागत और बाजार में अनिश्चितता के चलते किसान बंपर पैदावार के बावजूद घाटे में जी रहे हैं।गौरतलब है कि कुछ ही महीनों पहले उज्जैन में सिंहस्थ 2028 के लिए प्रस्तावित लैंड पूलिंग नीति को लेकर भी किसानों ने उग्र आंदोलन किया था, जिसके बाद मोहन यादव सरकार को अपनी नीति में बदलाव करने पड़े थे।
प्रशासन का पक्ष: बातचीत से समाधान की कोशिश जारी
प्रशासन पर आरोप हैं कि उसने रायसेन, विदिशा, हरदा, नर्मदापुरम और बुधनी जैसे जिलों के गांवों से निकलने वाली सड़कों पर बैरिकेड्स लगाकर किसानों को भोपाल पहुंचने से रोकने की कोशिश की।हालांकि, प्रशासन ने दमन के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पुलिस बल केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात है। अपर पुलिस अधीक्षक (होशंगाबाद) अनिल शर्मा ने बताया, "किसानों से शांतिपूर्ण तरीके से बातचीत की जा रही है। स्थिति को संभालने के लिए पर्याप्त बल मौजूद है और हम उनकी मांगों को लेकर लगातार संवाद बनाए हुए हैं।"फिलहाल, भोपाल की सीमाओं पर तनावपूर्ण शांति बनी हुई है और किसान मुख्यमंत्री आवास की ओर बढ़ने के अपने फैसले पर अड़े हुए हैं।