श्योपुर. मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान से जुड़े 19 महीने के नर चीते KNG22 की मौत के मामले ने वन्यजीव निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह चीता 25 अक्टूबर को श्योपुर के क्षेत्रीय वन मंडल में गंभीर रूप से घायल मिला था। उसे उपचार के लिए जबलपुर स्थित नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय के पशु चिकित्सा केंद्र ले जाया गया, जहां 27 अक्टूबर को उसकी मौत हो गई। आपातकालीन शल्य चिकित्सा के दौरान उसके शरीर से बंदूक के 5 छर्रे निकाले गए। KNG22 दक्षिण अफ्रीकी मादा चीता निर्वा की संतान था, जो भारत की चीता परियोजना का हिस्सा है। इस घटना के बाद राज्य सरकार ने वन विभाग के 6 अधिकारियों को निलंबित कर दिया है।
सैटेलाइट कॉलर लाइव प्रसारण की तरह काम नहीं करता
घटना के बाद कूनो राष्ट्रीय उद्यान के निदेशक उत्तम कुमार शर्मा ने एक टिप्पणी में सैटेलाइट आधारित निगरानी की सीमाएं स्पष्ट कीं। उन्होंने कहा कि सैटेलाइट कॉलर किसी वन्यजीव की लगातार लाइव लोकेशन उपलब्ध नहीं कराता। इससे केवल किसी निर्धारित समय पर जानवर की भौगोलिक स्थिति की जानकारी मिलती है। यह सूचना निगरानी दल तक पहुंचने और फिर वनकर्मियों के संबंधित स्थान पर पहुंचने के बीच चीता कई किलोमीटर दूर जा सकता है। शर्मा ने इस धारणा को गलत बताया कि कॉलर लगे वन्यजीव को टेलीविजन के सीधे प्रसारण की तरह हर पल देखा जा सकता है। उनके अनुसार, तकनीक से मिलने वाली लोकेशन और जमीन पर वास्तविक खोज के बीच समय का अंतर निगरानी की बड़ी चुनौती है।
6 घंटे के अंतराल पर भेजी जाती है लोकेशन
निदेशक के मुताबिक, कूनो में चीतों की निगरानी के लिए सैटेलाइट कॉलर और रेडियो रिसीवर दोनों का इस्तेमाल किया जाता है। कॉलर सामान्यतः 6 घंटे के अंतराल पर लोकेशन संबंधी जानकारी भेजने के लिए निर्धारित किए जाते हैं। यह अंतराल इसलिए रखा जाता है, ताकि नियमित सूचना मिलने के साथ बैटरी की क्षमता भी लंबे समय तक बनी रहे। यदि लोकेशन लगातार भेजी जाए तो ऊर्जा की खपत बढ़ सकती है और कॉलर की बैटरी अपेक्षाकृत जल्दी समाप्त हो सकती है। इसलिए निगरानी व्यवस्था में सूचना की आवृत्ति और उपकरण की कार्यक्षमता के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक होता है।
सैटेलाइट और रेडियो तकनीक की अलग-अलग भूमिका
कूनो में लगभग 15 चीतों की निगरानी के लिए दो तकनीकों का संयुक्त उपयोग किया जा रहा है। सैटेलाइट कॉलर बड़े और दुर्गम क्षेत्रों में जानवर की स्थिति का संकेत देते हैं, जबकि वीएचएफ रेडियो उपकरणों के जरिए मैदानी दल किसी चीते की अधिक सटीक स्थिति का पता लगाने की कोशिश करते हैं। सैटेलाइट से मिली सूचना निगरानी टीम को संभावित क्षेत्र बताती है, लेकिन वहां पहुंचकर जानवर को खोजने के लिए वनकर्मियों को जमीन पर अभियान चलाना पड़ता है। घने जंगल, विस्तृत क्षेत्र और वन्यजीवों की लगातार बदलती गतिविधियां इस प्रक्रिया को कठिन बनाती हैं। इसीलिए केवल कॉलर से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर तत्काल और निरंतर निगरानी संभव नहीं होती।
गोली के छर्रे मिलने से वन्यजीव सुरक्षा पर चिंता
KNG22 के शरीर से 5 गोली के छर्रे मिलने की घटना ने कूनो और आसपास के वन क्षेत्रों में वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। चीते के घायल मिलने और उपचार के दौरान मौत होने के मामले में निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठे हैं। हालांकि, सैटेलाइट कॉलर की तकनीकी सीमाएं बताने से इस घटना में निगरानी संबंधी संभावित चूक के सवाल अपने आप समाप्त नहीं हो जाते। यह जांच का विषय है कि चीते को गोली कब और कहां लगी, घटना की जानकारी समय पर क्यों नहीं मिल सकी और मैदानी निगरानी में क्या कमियां रहीं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अधिकारियों के निलंबन की कार्रवाई की गई है, जबकि घटना से जुड़े अन्य पहलुओं की जांच महत्वपूर्ण बनी हुई है।
निगरानी के साथ सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करना जरूरी
कूनो निदेशक की टिप्पणी से स्पष्ट है कि चीता संरक्षण में तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, लेकिन वह मैदानी निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था का विकल्प नहीं हो सकती। सैटेलाइट कॉलर से मिलने वाली जानकारी, वीएचएफ उपकरणों, वनकर्मियों की नियमित गश्त और स्थानीय स्तर पर सुरक्षा तंत्र के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है। विशेष रूप से उन क्षेत्रों में निगरानी मजबूत करनी होगी, जहां वन्यजीवों का आवागमन वन क्षेत्र से बाहर तक होता है। KNG22 की मौत ने यह सवाल भी सामने रखा है कि तकनीकी निगरानी के साथ वन्यजीवों को मानवीय हिंसा और अन्य खतरों से बचाने के लिए कितनी प्रभावी व्यवस्था मौजूद है। चीता परियोजना की सफलता केवल चीतों की संख्या बढ़ाने से नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा और समय पर उपचार सुनिश्चित करने से भी तय होगी।