भोपाल। मध्यप्रदेश में सीधी भर्ती से नियुक्त तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के प्रोबेशन पीरियड में 70%, 80% और 90% वेतन देने की व्यवस्था को लेकर विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट की डबल बेंच के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें कर्मचारियों को नियुक्ति की तारीख से 100% वेतन देने का निर्देश दिया गया था।
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग की है। सरकार ने अपनी याचिका में इसके लिए 13 प्रमुख आधार बताए हैं। उसका कहना है कि 2019 से अब तक प्रोबेशन पर रहे कर्मचारियों को पूरे वेतन के हिसाब से अंतर की राशि एकमुश्त देने पर राज्य के खजाने पर बड़ा वित्तीय भार पड़ेगा।
हाईकोर्ट ने 100% वेतन देने का दिया था आदेश
प्रोबेशन अवधि में कम वेतन देने का मामला पहले भी हाईकोर्ट में कर्मचारियों के पक्ष में जा चुका है। 6 जनवरी 2026 को हाईकोर्ट ने सीधी भर्ती से नियुक्त कर्मचारियों को नियुक्ति की तारीख से पूरा वेतन देने और बकाया राशि का 6% सालाना ब्याज के साथ भुगतान करने का आदेश दिया था।
इसके बाद डबल बेंच ने 9 सितंबर को 12 दिसंबर 2019 से लागू 70-80-90 प्रतिशत वेतन की व्यवस्था को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कर्मचारियों को नियुक्ति की तारीख से 100% वेतन देने का निर्देश दिया।
सरकार ने एरियर से वित्तीय भार बढ़ने का दिया तर्क
राज्य सरकार का कहना है कि यदि 2019 से अब तक प्रोबेशन पर रहे कर्मचारियों को 100% वेतन के आधार पर अंतर की राशि एक साथ देनी पड़ी, तो राज्य के बजट पर बड़ा अतिरिक्त भार आएगा।
याचिका में सरकार ने पुलिस, पटवारी और शिक्षक जैसी बड़ी भर्तियों का भी उल्लेख किया है। सरकार के अनुसार पुराने कर्मचारियों के एरियर और बढ़े हुए वेतन का असर भविष्य की भर्तियों के बजट प्रबंधन पर भी पड़ सकता है।सरकार ने तर्क दिया है कि अतिरिक्त वित्तीय भार का प्रभाव पूंजीगत कार्यों और जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए निर्धारित बजट पर भी पड़ सकता है।
अनुच्छेद 309 का हवाला देकर सरकार ने रखा पक्ष
राज्य सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 309 का हवाला देते हुए कहा है कि सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति और सेवा शर्तों से संबंधित नियम बनाने का अधिकार राज्य सरकार के पास है।
सरकार के मुताबिक 70%, 80% और 90% वेतन की व्यवस्था मनमाने तरीके से लागू नहीं की गई थी। इसे वित्त विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग में प्रक्रिया, परीक्षण और विचार-विमर्श के बाद सक्षम स्तर की मंजूरी से लागू किया गया था।
प्रोबेशन को प्रशिक्षण और दक्षता के आंकलन से जोड़ा
सरकार ने 1966 के सेवा नियमों और वित्तीय नियमों का हवाला देते हुए कहा है कि नियुक्ति के शुरुआती समय में कर्मचारियों को प्रशिक्षण और दक्षता के आंकलन से गुजरना होता है।
राज्य का तर्क है कि इसी आधार पर चरणबद्ध भुगतान की व्यवस्था बनाई गई थी। सरकार ने यह भी कहा है कि सेवा शर्तों से जुड़े नीतिगत फैसलों में न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा सीमित होना चाहिए, जब तक किसी स्पष्ट कानूनी प्रावधान का उल्लंघन न हो।
दूसरे राज्यों की व्यवस्था का भी दिया उदाहरण
राज्य सरकार ने अपनी याचिका में छत्तीसगढ़ समेत कुछ अन्य राज्यों की प्रोबेशन व्यवस्था का भी उल्लेख किया है। सरकार के अनुसार कुछ राज्यों में प्रोबेशन के दौरान स्टाइपेंड या कम वेतन देने की व्यवस्था रही है।हालांकि, छत्तीसगढ़ में 2023 में यह व्यवस्था समाप्त कर 100% वेतन लागू किया गया था। पुराने समय की अवधि के लिए एरियर का भुगतान नहीं किया गया था।
अब सुप्रीम कोर्ट में होगी मामले की सुनवाई
हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब राज्य सरकार ने मामले को सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा है। सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग की है।फिलहाल मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से अगली सुनवाई की तारीख तय नहीं हुई है। ऐसे में सीधी भर्ती से नियुक्त प्रोबेशनरी कर्मचारियों के वेतन और एरियर से जुड़ा विवाद अब शीर्ष अदालत के फैसले पर निर्भर करेगा।