नई दिल्ली : मतदाता सूची के वार्षिक पुनरीक्षण में हो रही देरी को लेकर कांग्रेस ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोला है। कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार नए 18 वर्ष के हुए 'जनरेशन Z' (Gen Z) युवाओं को वोटर लिस्ट में दर्ज होने से रोकने की कोशिश कर रही है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और पीएम नरेंद्र मोदी की तुलना करते हुए इसे "दो प्रधानमंत्रियों की कहानी" (A Tale of Two PMs) करार दिया।
राजीव गांधी ने दिया वोट का हक, मोदी सरकार छीनने में जुटी: जयराम रमेश
जयराम रमेश ने वर्ष 1988 में राजीव गांधी सरकार द्वारा किए गए संविधान संशोधन का उल्लेख करते हुए कहा कि एक समय देश में ऐसे प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने संविधान के अनुच्छेद 326 में संशोधन कर मतदान की न्यूनतम आयु सीमा 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की और युवाओं को सशक्त बनाया।दूसरी ओर, उन्होंने पीएम मोदी पर हमला बोलते हुए कहा, "एक पीएम ने Gen Z को वोट देने का अधिकार दिया, जबकि दूसरा कपटपूर्ण तरीकों से इसे छीनने पर आमादा है"। रमेश ने दावा किया कि वर्ष 2024 के बाद से मतदाता सूची का वार्षिक 'विशेष संक्षिप्त संशोधन' (Special Summary Revision - SSR) रोक दिया गया है, जो नए पात्र मतदाताओं को जोड़ने का मुख्य वैधानिक रास्ता है।

चुनाव आयोग में आंतरिक मतभेद की रिपोर्ट्स के बाद मचा घमासान
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जारी 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) प्रक्रिया के बीच चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने वार्षिक SSR प्रक्रिया को तुरंत फिर से शुरू करने का सुझाव दिया था। इसके साथ ही, रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि दोनों आयुक्तों ने नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े 'फॉर्म 6' में बदलाव और वोटर डेटाबेस के केंद्रीय नियंत्रण को लेकर 10 महीनों में कम से कम 14 बार अपनी लिखित आपत्तियां दर्ज कराई हैं।इन मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए कांग्रेस ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग दोहराई है। कांग्रेस का आरोप है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और पीएम मोदी की देखरेख में चुनाव आयोग की स्वायत्तता से समझौता किया जा रहा है।
चुनाव आयोग ने आरोपों को किया खारिज
विपक्ष के लगातार हमलों के बीच भारत निर्वाचन आयोग ने किसी भी प्रकार के आंतरिक गतिरोध या गड़बड़ी के दावों को खारिज किया है। आयोग का कहना है कि किसी भी संस्था में आंतरिक विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और सुझाव आना एक सामान्य प्रक्रिया है।आयोग ने स्पष्ट किया कि SIR और मतदाता सूची से जुड़े सभी फैसले सर्वसम्मति से और स्थापित वैधानिक प्रक्रियाओं के तहत ही लिए गए हैं। चुनावी कानूनों के अनुसार, मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का अधिकार कानून के तहत संबंधित मतदाता पंजीकरण अधिकारियों (EROs) के पास पूरी तरह सुरक्षित है।