नई दिल्ली। देशभर में मानसून की धीमी रफ्तार ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। कई राज्यों में अब भी अच्छी बारिश का इंतजार है, जबकि दिल्ली-एनसीआर में उमस और गर्मी लोगों को परेशान कर रही है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार मानसून की सुस्ती के पीछे सबसे बड़ी वजह अल-नीनो और बंगाल की खाड़ी में समय पर मजबूत मौसम प्रणाली का नहीं बनना है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर दिल्ली-एनसीआर में अच्छी बारिश कब होगी और क्या जुलाई में मानसून रफ्तार पकड़ पाएगा?
मानसून की रफ्तार आखिर धीमी क्यों पड़ गई?
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, मानसून के आगे बढ़ने के लिए बंगाल की खाड़ी में लो-प्रेशर एरिया (निम्न दबाव का क्षेत्र) बनना बेहद जरूरी होता है। इस बार शुरुआती दौर में ऐसा सिस्टम विकसित नहीं हो पाया। इसके अलावा हिंद महासागर से आने वाली सोमालिया जेट स्ट्रीम भी कमजोर रही, जिससे मानसून की गति प्रभावित हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि जुलाई के पहले सप्ताह में बंगाल की खाड़ी में नया सिस्टम बनने के बाद मानसून को गति मिल सकती है। तब जाकर दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत में व्यापक बारिश की संभावना बनेगी।
क्या जुलाई-अगस्त में होगी बारिश की भरपाई?
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि जून में हुई बारिश की कमी की पूरी भरपाई होना मुश्किल है। इसकी सबसे बड़ी वजह इस बार सक्रिय अल-नीनो है, जो मानसून को कमजोर करने का काम करता है। हालांकि जुलाई और अगस्त के दौरान कुछ अच्छे बारिश वाले दौर देखने को मिल सकते हैं, लेकिन पूरे सीजन में सामान्य से कम वर्षा की आशंका बनी हुई है।
जलवायु परिवर्तन भी बड़ी वजह
विशेषज्ञों का कहना है कि मौसम का पैटर्न लगातार बदल रहा है। पहले जहां पश्चिमी विक्षोभ अक्टूबर-नवंबर में सक्रिय होते थे, अब उनका असर दिसंबर-जनवरी तक खिंच रहा है और कई बार अप्रैल-मई तक भी बना रहता है। इसका सीधा असर मानसून और तापमान पर पड़ रहा है। दिल्ली में सर्दियां छोटी होती जा रही हैं, जबकि गर्मी का समय लगातार बढ़ रहा है। यही वजह है कि मौसम अब पहले की तुलना में अधिक अनिश्चित हो गया है।
दिल्ली में बारिश के बावजूद क्यों हो जाता है जलभराव?
विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली की सबसे बड़ी समस्या खराब ड्रेनेज व्यवस्था है। कई जगह सीवर लाइनें जाम हैं और प्लास्टिक कचरे से भरी हुई हैं। यही कारण है कि केवल 40 मिमी बारिश में भी राजधानी के कई इलाकों में जलभराव और ट्रैफिक जाम की स्थिति बन जाती है। उनका कहना है कि मानसून से पहले नालों और सीवर की सफाई पूरी हो जानी चाहिए और भारी बारिश की चेतावनी मिलने पर प्रशासन को पहले से पंप और राहत व्यवस्था तैयार रखनी चाहिए।
24 से 48 घंटे पहले मिल जाती है चेतावनी
मौसम एजेंसियों के मुताबिक जब उत्तर भारत, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से आने वाली हवाएं आपस में मिलती हैं, तब अचानक भारी बारिश या बादल फटने जैसी स्थिति बन सकती है। ऐसे सिस्टम की जानकारी 24 से 48 घंटे पहले मिल जाती है और प्रशासन को समय रहते अलर्ट भेज दिया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन चेतावनियों पर तेजी से कार्रवाई हो तो नुकसान काफी हद तक कम किया जा सकता है।
मुख्य बातें (Highlights)
| पॉइंट | जानकारी |
|---|---|
| मानसून की सुस्ती की वजह | बंगाल की खाड़ी में लो-प्रेशर सिस्टम नहीं बना, अल-नीनो का असर |
| दिल्ली में अच्छी बारिश | जुलाई के पहले सप्ताह में संभावना |
| जुलाई-अगस्त का अनुमान | कुछ अच्छे बारिश वाले दौर, लेकिन कुल बारिश सामान्य से कम रह सकती है |
| सबसे बड़ी चुनौती | अल-नीनो और जलवायु परिवर्तन |
| दिल्ली की समस्या | खराब ड्रेनेज और जलभराव |
| मौसम एजेंसियों की चेतावनी | भारी बारिश का अलर्ट 24-48 घंटे पहले मिल जाता है |