नई दिल्ली. अल नीनो के चलते इस साल देश में सामान्य से 13 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई। दक्षिणी राज्यों में सूखे के हालात पैदा हुए हैं। इसके फरवरी तक बने रहने से सर्दियों की बारिश भी घट सकती है। इससे सर्दियों के तापमान में भी बढ़ोतरी हो सकती है। एक रिपोर्ट में यह आशंका जताई गई है कि इस बार फरवरी में ही गर्मी दस्तक दे सकती है। क्लाइमेट ट्रेंड्स की ओर से जारी रिपोर्ट के अनुसार अल नीनो और वैश्विक तापवृद्धि का संयुक्त असर आने वाले महीनों में तापमान के नए रिकॉर्ड बनने की आशंका को बढ़ाता है। वर्ष 2026 तथा वर्ष 2027 इस दशक के सबसे गर्म वर्षों में शामिल हो सकते हैं। मौसम की इस अनियमितता ने कृषि और जल संसाधनों पर दबाव बढ़ा दिया है।
फसलों पर पड़ने वाला प्रभाव
रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि जलाशयों में कम भंडारण घटता भूजल और मिट्टी में नमी की कमी रबी तथा उसके बाद की गर्मियों वाली फसलों पर सीधा असर डाल सकती है। क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला के मुताबिक अल नीनो पहले से गर्म होती जलवायु के ऊपर अपना असर दिखा रहा है जिससे आने वाले महीनों में तापमान के रिकॉर्ड टूटने की आशंका बढ़ रही है। गर्मी को किसी एक असाधारण घटना की तरह देखने के बजाय लगातार बढ़ते जोखिम के तौर पर देखते हुए तैयारी करनी होगी। किसानों को अपनी फसल योजना में बदलाव की जरूरत पड़ सकती है। जल संरक्षण के उपाय अपनाने की सलाह दी जा रही है। लंबे समय तक सूखे की स्थिति बनी रही तो खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
अगस्त बना सबसे गर्म महीना
रिपोर्ट के अनुसार अगस्त 2026 भारत में वर्ष 1901 के बाद सबसे गर्म महीना रहा। सितंबर भी रिकॉर्ड में पांचवां सबसे गर्म महीना दर्ज किया गया। तेलंगाना कर्नाटक आंध्र प्रदेश राजस्थान और महाराष्ट्र में सूखे की घोषणा की गई है। महाराष्ट्र के 75 प्रतिशत हिस्से में सूखे की स्थिति से पानी की उपलब्धता को लेकर भी चिंता बढ़ी है। इन राज्यों में जलाशयों का जल स्तर सामान्य से काफी नीचे चला गया है। गर्मी और कम बारिश के संयोजन ने कृषि उत्पादन पर दबाव डाला है। मौसम विभाग के आंकड़े तापमान में असामान्य वृद्धि की पुष्टि करते हैं। आने वाले महीनों में भी यही रुझान जारी रह सकता है।
दक्षिणी राज्यों में सूखे की स्थिति
दक्षिणी भारत के कई राज्यों में सूखे की घोषणा हो चुकी है। तेलंगाना कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में जल संकट गहराया है। महाराष्ट्र के बड़े हिस्से में पानी की उपलब्धता घटी है। जलाशयों में कम भंडारण के कारण सिंचाई प्रभावित हो रही है। भूजल स्तर भी गिर रहा है जिससे कृषि और घरेलू उपयोग दोनों प्रभावित हैं। मिट्टी में नमी की कमी ने रबी फसलों की बुआई को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। स्थानीय प्रशासन राहत उपायों पर काम कर रहा है। लंबे समय तक यह स्थिति बनी रही तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा।
मॉनसून प्रणालियों में बदलाव
स्काईमेट वेदर के उपाध्यक्ष के मुताबिक मॉनसून की प्रणालियों का व्यवहार बदल रहा है। कम दबाव वाली प्रणालियां सामान्य से अधिक समय तक जमीन पर ठहर रही हैं। उनके अनुसार इससे अत्यधिक बारिश और बादल फटने जैसी स्थितियों में बढ़ोतरी दर्ज हुई है जो पहले कम देखने को मिलती थीं। एक ओर कुछ क्षेत्रों में सूखा तो दूसरी ओर कुछ जगहों पर अचानक भारी वर्षा की घटनाएं बढ़ी हैं। मौसम की यह अनियमितता जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है। अल नीनो के साथ मिलकर यह स्थिति और जटिल हो गई है। पूर्वानुमान मॉडल भी आने वाले महीनों में अनियमित मौसम की संभावना जता रहे हैं।
तापमान के नए रिकॉर्ड की आशंका
क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिपोर्ट के अनुसार अल नीनो और वैश्विक तापवृद्धि का संयुक्त असर तापमान के नए रिकॉर्ड बनने की आशंका को बढ़ाता है। वर्ष 2026 और 2027 इस दशक के सबसे गर्म वर्षों में शामिल हो सकते हैं। सर्दियों के मौसम में भी तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना है। फरवरी में ही गर्मी शुरू होने से गर्मी का मौसम लंबा खिंच सकता है। शहरी क्षेत्रों में हीट वेव की घटनाएं बढ़ सकती हैं। स्वास्थ्य संबंधी जोखिम भी बढ़ने की आशंका है। सरकार और स्थानीय निकायों को गर्मी से निपटने की तैयारी पहले से करनी होगी।
तैयारी और सतर्कता की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि गर्मी को किसी एक असाधारण घटना की तरह देखने के बजाय लगातार बढ़ते जोखिम के तौर पर देखते हुए तैयारी करनी होगी। जल संरक्षण फसल विविधीकरण और जलवायु अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाना जरूरी है। जलाशयों के बेहतर प्रबंधन और भूजल पुनर्भरण पर ध्यान देना होगा। किसानों को मौसम पूर्वानुमान के आधार पर बुआई की योजना बनानी चाहिए। शहरी क्षेत्रों में हीट एक्शन प्लान को मजबूत करने की जरूरत है। अल नीनो के प्रभाव को कम करने के लिए दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव है।