नई दिल्ली. विश्व मौसम संगठन यानी WMO ने अल नीनो को लेकर ताजा चेतावनी जारी की है जिसमें संभावना जताई गई है कि यह घटना Feb.-2027 तक बनी रह सकती है। अगर यह अनुमान सही साबित होता है तो इसका प्रभाव भारत में अगले मानसून की शुरुआत तक महसूस किया जा सकता है। मौसम विज्ञानियों का कहना है कि सर्दियों की बारिश और तापमान पर भी इसका असर पड़ सकता है। पहले के अनुमान में नवंबर में तापमान के चरम पर पहुंचने की बात कही गई थी लेकिन नए आकलन में दिसंबर का समय बताया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि अल नीनो का प्रभाव क्षेत्र और अवधि दोनों बढ़ रहे हैं। यह स्थिति कृषि और जल संसाधनों के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर सकती है।
प्रशांत महासागर में असामान्य तापमान वृद्धि
WMO के अनुसार प्रशांत महासागर में भूमध्य रेखा के पास समुद्र का तापमान वर्तमान में सामान्य से तीन डिग्री तक अधिक दर्ज किया जा रहा है। इसमें वृद्धि का सिलसिला जारी है और संभावना जताई गई है कि Dec.-2026 में यह उच्च स्तर पर पहुंचकर चार डिग्री तक जा सकता है। यह अब तक का सर्वाधिक तापमान होगा जबकि इससे पहले 2015 में अधिकतम 2.6 डिग्री की बढ़ोतरी का रिकॉर्ड था। संगठन का कहना है कि दिसंबर से तापमान में गिरावट का दौर शुरू हो सकता है लेकिन Feb.-2027 में भी यह सामान्य स्तर जो 1.6 डिग्री है उससे कहीं अधिक बना रह सकता है। यह असामान्य गर्मी वैश्विक मौसम चक्र को प्रभावित करने वाली है।
अल नीनो के दायरे का विस्तार और नई आशंकाएं
नए अनुमानों से साफ है कि अल नीनो का दायरा पहले के मुकाबले विस्तृत हो रहा है। आशंका जताई जा रही है कि तापमान के सामान्य स्तर तक आने में Feb.-2027 की बजाय और अधिक समय लग सकता है। यानी March-April 2027 तक भी अल नीनो की स्थिति बनी रह सकती है। इस विस्तारित अवधि से भारत सहित कई देशों में मौसमी असंतुलन की आशंका बढ़ गई है। मौसम वैज्ञानिक लंबे समय तक चलने वाले इस प्रभाव को लेकर चिंतित हैं क्योंकि यह सर्दियों की बारिश और गर्मी दोनों को प्रभावित कर सकता है। इस स्थिति में जल संरक्षण और फसल योजना को लेकर विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत बताई जा रही है।
मानसूनी बारिश और धान उत्पादन पर असर
अल नीनो के चलते देश में मानसूनी बारिश सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम हुई है। इसके कारण प्रमुख फसल धान की बुवाई 17 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में घट गई है। अनुमान लगाया जा रहा है कि इससे करीब 70 लाख टन धान उत्पादन कम हो सकता है। आमतौर पर देश में 15 करोड़ टन चावल का उत्पादन होता है जबकि खपत लगभग 10 करोड़ टन की है। उत्पादन में गिरावट से बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ने और खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंताएं पैदा होने की आशंका है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर वैकल्पिक उपाय न किए गए तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका असर साफ दिख सकता है।
विशेषज्ञों की राय और मिश्रित प्रभाव
मौसम विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉ. के.जे. रमेश ने कहा कि अल नीनो का मिश्रित असर मानसून पर देखा गया है जिससे धान की बुवाई में कमी आई है। लेकिन जितनी आशंका जताई जा रही थी वैसा गंभीर संकट नहीं उत्पन्न हुआ। उनके अनुसार Feb.-March तक स्थितियां सामान्य हो जानी चाहिए। जहां तक सर्दियों की बारिश का सवाल है अब तक के पूर्वानुमान बता रहे हैं कि वह सामान्य से अधिक हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि सही प्रबंधन और समय पर नीतिगत हस्तक्षेप से प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। फिर भी सतर्कता बनाए रखने की सलाह दी जा रही है।
अनाज और जल संसाधनों पर संभावित संकट
अल नीनो की लंबी अवधि से अनाज उत्पादन और जल उपलब्धता दोनों पर दबाव बढ़ने की आशंका है। कम बारिश के कारण जलाशयों का स्तर प्रभावित हो सकता है जिससे सिंचाई और पेयजल आपूर्ति दोनों चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। धान जैसी जल आधारित फसलों पर सीधा असर पड़ने से खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। सरकार और कृषि विभागों को वैकल्पिक फसल चक्र तथा जल संरक्षण उपायों पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत बताई जा रही है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर हो रहे तापमान परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी। कुल मिलाकर यह चेतावनी भारत के लिए सतर्क रहने का स्पष्ट संकेत है।