दार्जिलिंग की नम पहाड़ियों और जलधाराओं के बीच रहने वाला दुर्लभ हिमालयन सैलामेंडर अब विलुप्ति के गंभीर खतरे से जूझ रहा है। करोड़ों साल पुराना यह जीव केवल एक प्रजाति नहीं, बल्कि हिमालयी पारिस्थितिकी के स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। जंगल, पानी और जैव विविधता की रक्षा के लिए अब वैज्ञानिकों, वन विभाग, स्थानीय ग्रामीणों और अंतरराष्ट्रीय स्तर के शोधकर्ताओं ने साझा अभियान शुरू किया है।
डायनासोर काल का जीव, अब इंसानी गतिविधियों से संकट में
विशेषज्ञों के अनुसार हिमालयन सैलामेंडर धरती के प्राचीन जीवों में शामिल है, जिसने बड़े प्राकृतिक बदलावों को भी झेला, लेकिन अब तेजी से बढ़ते शहरीकरण, जंगलों की कटाई और प्रदूषण ने इसके अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है।
पहले दार्जिलिंग के करीब 80 आर्द्र क्षेत्रों में दिखाई देने वाला यह जीव अब केवल 15 से 20 स्थानों तक सीमित रह गया है।
‘ग्रीन ऑस्कर’ विजेता बरखा सुब्बा भी मुहिम में शामिल
व्हिटली अवार्ड 2026 से सम्मानित शोधकर्ता बरखा सुब्बा इस संरक्षण अभियान का अहम चेहरा बनी हुई हैं। उनका कहना है कि चाय बागानों में रासायनिक कीटनाशकों का बढ़ता इस्तेमाल, कंक्रीट निर्माण और जलवायु परिवर्तन इस दुर्लभ जीव के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं।
उन्होंने बताया कि मई से अगस्त तक के प्रजनन काल में सैलामेंडर उथले जलाशयों तक पहुंचता है और इसी दौरान सड़क दुर्घटनाओं का भी शिकार होता है।
नामथिंग पोखरी और पंचपोखरी में संरक्षण कार्य तेज
वन विभाग ने दार्जिलिंग के नामथिंग पोखरी, पोखरीटार और पंचपोखरी क्षेत्रों में विशेष संरक्षण योजना शुरू की है। प्राकृतिक जलधाराओं को सुरक्षित रखने, नमी बनाए रखने और कंक्रीट निर्माण रोकने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं।
कर्सियांग फॉरेस्ट डिवीजन ने पंचपोखरी के पांच हेक्टेयर इलाके को ‘सैलामेंडर अभयारण्य’ घोषित करने का प्रस्ताव भी केंद्र सरकार को भेजा है।
स्थानीय लोगों की भागीदारी बनी सबसे बड़ी ताकत
इस अभियान में स्थानीय ग्रामीणों और चाय बागान प्रबंधकों को भी जोड़ा गया है। लोगों को समझाया जा रहा है कि यदि सैलामेंडर सुरक्षित रहेगा, तो पहाड़ों का जल, जंगल और पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा।
रासायनिक कीटनाशकों के सीमित उपयोग और प्राकृतिक जल स्रोतों की रक्षा के लिए लगातार जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं।
चिकित्सा विज्ञान के लिए भी महत्वपूर्ण है यह जीव
दार्जिलिंग के पद्मजा नायडू हिमालयन जूलॉजिकल पार्क में 2006 से हिमालयन सैलामेंडर के प्रजनन और संरक्षण पर काम चल रहा है। वैज्ञानिक इसकी पुनर्जीवन क्षमता पर भी अध्ययन कर रहे हैं।
यह जीव अपने क्षतिग्रस्त अंगों और पूंछ को दोबारा विकसित कर सकता है, जिसे भविष्य के चिकित्सा अनुसंधान के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पर्यावरण और विकास के संतुलन की सीख
विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयन सैलामेंडर को बचाने की यह पहल केवल एक जीव की रक्षा नहीं, बल्कि हिमालयी पारिस्थितिकी को बचाने की लड़ाई है। यह अभियान यह संदेश भी देता है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाकर ही भविष्य सुरक्षित किया जा सकता है।