नई दिल्ली. भारतीय वायुसेना की परिवहन क्षमता को आधुनिक बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम जल्द उठने वाला है। रक्षा मंत्रालय ने 80 मध्यम परिवहन विमानों की खरीद से जुड़ी तकनीकी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण पूरा कर लिया है। अब औपचारिक प्रस्ताव आमंत्रण जारी होने के बाद परियोजना वाणिज्यिक मूल्यांकन, परीक्षण और अनुबंध की दिशा में आगे बढ़ेगी। यह कार्यक्रम केवल पुराने विमानों के प्रतिस्थापन तक सीमित नहीं है, बल्कि बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य में भारत की सैन्य तैयारियों को नई ऊंचाई देने की व्यापक रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है।
तीन दशक पुराने बेड़े की जगह लेंगे आधुनिक विमान
भारतीय वायुसेना लंबे समय से सोवियत मूल के एएन-32 परिवहन विमानों का उपयोग कर रही है। इन विमानों ने सैनिकों, हथियारों, सैन्य उपकरणों, राहत सामग्री और आपदा प्रबंधन अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि समय के साथ इनकी परिचालन क्षमता, रखरखाव लागत और तकनीकी सीमाएं सामने आने लगी हैं। आधुनिक युद्ध परिस्थितियों और तेजी से बदलती सैन्य आवश्यकताओं को देखते हुए अब ऐसे विमानों की जरूरत महसूस की जा रही है, जो अधिक भार वहन करने के साथ कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी प्रभावी ढंग से संचालन कर सकें। हाल के वर्षों में सीमावर्ती क्षेत्रों में बढ़ी सामरिक सक्रियता ने इस आवश्यकता को और अधिक स्पष्ट कर दिया है।
तीन वैश्विक कंपनियों के बीच कड़ा मुकाबला
इस महत्वाकांक्षी परियोजना में तीन प्रमुख अंतरराष्ट्रीय विमान निर्माता कंपनियां प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। यूरोप की एयरबस अपने ए-400एम परिवहन विमान के साथ मैदान में है, जबकि अमेरिका की लॉकहीड मार्टिन सी-130जे विमान की पेशकश कर रही है। ब्राजील की एम्ब्रेयर अपने आधुनिक सी-390 मिलेनियम विमान के साथ प्रतिस्पर्धा में शामिल है। तीनों कंपनियां भारतीय उद्योग के साथ साझेदारी में निर्माण की योजना प्रस्तुत कर चुकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी क्षमता, जीवनचक्र लागत, रखरखाव सुविधा और भारत में उत्पादन की संभावनाएं अंतिम चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। यह प्रतिस्पर्धा भारतीय रक्षा विनिर्माण क्षेत्र के लिए भी नए अवसर लेकर आएगी।
सीमाओं पर तेज सैन्य तैनाती बनेगी आसान
नए मध्यम परिवहन विमान भारतीय वायुसेना को ऐसी क्षमता प्रदान करेंगे, जो हल्के और भारी परिवहन विमानों के बीच की परिचालन जरूरतों को प्रभावी ढंग से पूरा करेगी। इन विमानों में लगभग 18 से 30 टन तक भार ले जाने की क्षमता होगी। स्वदेशी जोरावर हल्के टैंक, एम-777 अल्ट्रा-लाइट हॉवित्जर, ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली तथा आकाश वायु रक्षा प्रणाली जैसे महत्वपूर्ण सैन्य उपकरणों को सीमावर्ती क्षेत्रों तक तेजी से पहुंचाया जा सकेगा। इसके अलावा छोटे, कच्चे और दुर्गम रनवे से संचालन की क्षमता इन्हें लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश तथा अन्य पर्वतीय इलाकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी बनाएगी। आधुनिक रात्रि नेविगेशन प्रणाली और कम ऊंचाई पर सुरक्षित उड़ान की सुविधा विशेष सैन्य अभियानों में भी निर्णायक भूमिका निभाएगी।
‘मेक इन इंडिया’ को मिलेगा नई ऊर्जा का संबल
सरकार इस परियोजना को केवल रक्षा खरीद तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि इसे घरेलू रक्षा उद्योग के विस्तार का माध्यम भी बना रही है। प्रस्तावित योजना के अनुसार प्रारंभिक कुछ विमान विदेश से तैयार अवस्था में आएंगे, जबकि अधिकांश विमानों का निर्माण और असेंबली भारत में विदेशी कंपनी तथा उसके भारतीय साझेदार के संयुक्त सहयोग से किया जाएगा। सरकार का उद्देश्य धीरे-धीरे इन विमानों में स्वदेशी सामग्री की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक तक पहुंचाना है। इससे भारतीय उद्योग को अत्याधुनिक एयरोस्पेस तकनीक, उच्च गुणवत्ता वाले विनिर्माण और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भागीदारी का अवसर मिलेगा। दीर्घकाल में यह रणनीति रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को भी मजबूत करेगी।
भविष्य की तकनीक के अनुरूप होगा पूरा प्लेटफॉर्म
भारतीय वायुसेना ऐसे विमान की तलाश में है, जिसका ढांचा खुली वास्तुकला आधारित प्रणाली पर विकसित हो। इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि भविष्य में स्वदेशी मिशन कंप्यूटर, सामरिक डेटा लिंक, संचार प्रणाली तथा अन्य डिजिटल तकनीकों को विदेशी कंपनियों पर निर्भर हुए बिना जोड़ा जा सकेगा। इससे विमान लंबे समय तक आधुनिक बने रहेंगे और बदलती सुरक्षा चुनौतियों के अनुसार उनका उन्नयन अपेक्षाकृत सरल होगा। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक सैन्य अभियानों में केवल विमान की क्षमता ही नहीं, बल्कि उसकी तकनीकी अनुकूलन क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मजबूत होगी भारत की सामरिक स्थिति
हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती नौसैनिक और वायु गतिविधियों तथा सीमावर्ती क्षेत्रों में बदलती सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए भारत अपनी सैन्य परिवहन क्षमता को नई दिशा देना चाहता है। किसी भी आधुनिक सेना के लिए तेज गति से सैनिकों, हथियारों और राहत सामग्री की आवाजाही रणनीतिक बढ़त का आधार होती है। नए मध्यम परिवहन विमान भारतीय वायुसेना को न केवल युद्धकालीन परिस्थितियों में अधिक प्रभावी बनाएंगे, बल्कि प्राकृतिक आपदाओं, मानवीय सहायता अभियानों और अंतरराष्ट्रीय राहत कार्यों में भी देश की क्षमता को सुदृढ़ करेंगे। यदि यह परियोजना निर्धारित समयसीमा में पूरी होती है, तो आने वाले दशक में भारत की वायु परिवहन शक्ति एशिया की सबसे आधुनिक और सक्षम सैन्य परिवहन प्रणालियों में शामिल हो सकती है।