जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और समग्र विकास के लिए भी गंभीर चुनौती बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) की ‘चिल्ड्रन्स क्लाइमेट रिस्क रिपोर्ट 2026’ के अनुसार भारत के बच्चे दुनिया में सबसे अधिक जलवायु जोखिमों का सामना कर रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि बढ़ती गर्मी, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़ और प्रदूषण जैसी परिस्थितियां बच्चों के जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहरा सकता है।
भारत के आधे से अधिक बच्चे बहुस्तरीय जोखिम में
रिपोर्ट के अनुसार भारत के लगभग 55 प्रतिशत बच्चे एक साथ तीन या उससे अधिक जलवायु संबंधी खतरों का सामना कर रहे हैं। यह स्थिति वैश्विक औसत से कहीं अधिक गंभीर मानी जा रही है। बच्चों पर पड़ने वाला यह प्रभाव केवल प्राकृतिक आपदाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे उनकी शिक्षा, पोषण, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा भी प्रभावित हो रही है। ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे विशेष रूप से अधिक जोखिम में हैं क्योंकि उनके पास बदलती परिस्थितियों से निपटने के संसाधन सीमित हैं।
भीषण गर्मी के मामले में भारत सबसे अधिक प्रभावित
रिपोर्ट में सबसे चिंताजनक तथ्य यह सामने आया है कि अत्यधिक गर्मी के खतरे के मामले में भारत को सर्वोच्च जोखिम श्रेणी में रखा गया है। लगातार बढ़ते तापमान और लंबे समय तक चलने वाली गर्म लहरें बच्चों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल रही हैं। छोटे बच्चों में निर्जलीकरण, थकान, हीट स्ट्रोक और पोषण संबंधी समस्याओं का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। शहरी क्षेत्रों में कंक्रीट संरचनाओं और सीमित हरित क्षेत्रों के कारण स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो गई है।
सूखा और खाद्य सुरक्षा भी बढ़ा रहे चिंता
भीषण गर्मी के साथ-साथ सूखे की समस्या भी बच्चों के भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में वर्षा की कमी सीधे खाद्य उत्पादन को प्रभावित करती है, जिसका असर बच्चों के पोषण स्तर पर पड़ता है। रिपोर्ट के अनुसार भारत सूखे के जोखिम के मामले में भी अत्यधिक संवेदनशील देशों में शामिल है। जब खेती प्रभावित होती है तो परिवारों की आय घटती है और बच्चों के स्वास्थ्य तथा शिक्षा पर उसका सीधा असर दिखाई देता है।
प्रदूषण और बीमारियों का बढ़ता दुष्चक्र
जलवायु परिवर्तन के कारण केवल तापमान ही नहीं बढ़ रहा, बल्कि इससे कई संक्रामक और पर्यावरणजनित बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है। प्रदूषित हवा बच्चों के फेफड़ों और मस्तिष्क के विकास को प्रभावित कर रही है। वहीं बाढ़ और जलभराव जैसी परिस्थितियों से मच्छरजनित रोगों का प्रसार बढ़ता है। मलेरिया, डेंगू और अन्य संक्रमण बच्चों को अधिक तेजी से प्रभावित करते हैं क्योंकि उनकी प्रतिरोधक क्षमता वयस्कों की तुलना में कम विकसित होती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे आने वाले समय की बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती मान रहे हैं।
शिक्षा और मानसिक विकास पर भी पड़ रहा असर
चरम मौसम की घटनाएं केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बच्चों की शिक्षा और मानसिक स्थिति को भी प्रभावित कर रही हैं। अत्यधिक गर्मी, बाढ़ या अन्य प्राकृतिक आपदाओं के कारण स्कूलों को बंद करना पड़ता है, जिससे पढ़ाई बाधित होती है। बार-बार आने वाली आपदाएं बच्चों में असुरक्षा और तनाव की भावना भी पैदा कर सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझते हुए शिक्षा प्रणाली को भी अधिक लचीला और आपदा-प्रतिरोधी बनाने की आवश्यकता है।
समय रहते कार्रवाई की जरूरत
यूनिसेफ की रिपोर्ट स्पष्ट संकेत देती है कि बच्चों को जलवायु संकट से बचाने के लिए तत्काल और दीर्घकालिक दोनों स्तरों पर प्रयास जरूरी हैं। स्वच्छ ऊर्जा, हरित बुनियादी ढांचा, जल संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और बच्चों के अनुकूल आपदा प्रबंधन रणनीतियों को प्राथमिकता देनी होगी। साथ ही अभिभावकों और समुदायों को भी बच्चों को गर्मी, प्रदूषण और जलवायु संबंधी जोखिमों से बचाने के लिए जागरूक होना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि आज उठाए गए कदम ही आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की नींव रखेंगे।