नई दिल्ली. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 7 साल के अंतराल के बाद भारत पहुंचे हैं। उनका यह दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत और चीन के रिश्तों में लंबे समय तक तनाव रहा। हाल के महीनों में दोनों देशों के बीच सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर संपर्क बढ़ा है। शी की भारत यात्रा को इसी सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में हो रहे 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मुलाकात भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
भारत-चीन के बीच रूस कैसे बन रहा है ‘कनेक्टिंग फैक्टर’?
भारत और चीन के रिश्तों में रूस की भूमिका को लेकर रूसी मीडिया ने खास तर्क दिया है। दोनों देशों के रूस के साथ लंबे समय से मजबूत संबंध हैं और इसी वजह से मॉस्को को एक ऐसे साझा संपर्क सूत्र के रूप में देखा जा रहा है, जो नई दिल्ली और बीजिंग के बीच संवाद की जमीन तैयार कर सकता है। भारत के लिए रूस रक्षा और ऊर्जा का महत्वपूर्ण साझेदार है, जबकि चीन के साथ भी मॉस्को के रणनीतिक और आर्थिक संबंध बेहद गहरे हैं। ऐसे में ब्रिक्स और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर रूस दोनों देशों को एक ही मेज पर लाने वाला प्रभावी माध्यम बन सकता है।
पुतिन की एक दिन पहले मौजूदगी ने बनाया कूटनीतिक माहौल
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन शी जिनपिंग से एक दिन पहले नई दिल्ली पहुंचे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ महत्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता की। दोनों नेताओं ने रक्षा, ऊर्जा, व्यापार, निवेश, अंतरिक्ष और अन्य क्षेत्रों में सहयोग की समीक्षा की। भारत और रूस ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक ले जाने की दिशा में भी प्रतिबद्धता जताई है। ऐसे समय में पुतिन की दिल्ली मौजूदगी ने ब्रिक्स सम्मेलन से पहले भारत-रूस संबंधों की मजबूती को रेखांकित किया है।
ऊर्जा से लेकर सुरक्षा तक रूस से जुड़े हैं भारत-चीन
रूस का महत्व केवल कूटनीति तक सीमित नहीं है। भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूसी तेल पर महत्वपूर्ण निर्भरता रखता है, जबकि चीन भी रूस के ऊर्जा संसाधनों का बड़ा खरीदार है। दूसरी ओर भारत की सुरक्षा व्यवस्था में रूस की भूमिका दशकों पुरानी है और रक्षा सहयोग अब भी दोनों देशों के संबंधों का प्रमुख आधार है। यही साझा आर्थिक और रणनीतिक जुड़ाव रूस को भारत और चीन के बीच संवाद के लिए एक उपयोगी मंच उपलब्ध कराता है। हालांकि यह मानना सही नहीं होगा कि रूस दोनों देशों के विवादों का समाधान अकेले कर सकता है।
कैलाश मानसरोवर यात्रा से बढ़ा लोगों के बीच संपर्क
भारत और चीन के संबंधों में सुधार का असर केवल शीर्ष स्तर की कूटनीति तक सीमित नहीं है। कैलाश मानसरोवर यात्रा का दोबारा शुरू होना भी दोनों देशों के बीच सामान्य संपर्क बहाल होने का महत्वपूर्ण संकेत है। तिब्बत में स्थित कैलाश मानसरोवर भारत के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यात्रा बहाल होने से दोनों देशों के बीच लोगों के आवागमन और सांस्कृतिक संपर्क को बढ़ावा मिला है। इससे राजनीतिक तनाव के बीच मानवीय रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिश को भी बल मिला है।
डोभाल की चीन यात्रा और 25वें दौर की वार्ता
भारत और चीन के बीच बातचीत का सिलसिला भी लगातार आगे बढ़ा है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच 25वें दौर की वार्ता हुई। इसके बाद दोनों पक्षों की ओर से साझा बयान भी जारी किया गया। यह प्रक्रिया बताती है कि सीमा विवाद के बावजूद दोनों देश संवाद के रास्ते को पूरी तरह बंद नहीं करना चाहते। विशेषज्ञों के अनुसार, यही लगातार जारी बातचीत आगे के रिश्तों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
गलवान के बाद सुधार जरूर, लेकिन भरोसे की कमी बरकरार
भारत-चीन संबंधों में सुधार के संकेतों के बावजूद कई गंभीर मतभेद अभी भी मौजूद हैं। सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन और रणनीतिक अविश्वास जैसे मुद्दे आसानी से खत्म होने वाले नहीं हैं। हालिया कूटनीतिक प्रगति के बावजूद दोनों देशों के बीच आर्थिक और राजनीतिक रिश्तों में पूरी तरह पुराना भरोसा लौटना बाकी है। इसलिए शी जिनपिंग की यात्रा को तत्काल किसी बड़े समझौते के बजाय संवाद की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के अवसर के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
पाकिस्तान और चीन की दोस्ती भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती
भारत और चीन के बीच नजदीकी बढ़ने के बावजूद पाकिस्तान के साथ चीन के मजबूत संबंध नई दिल्ली की चिंता का प्रमुख कारण हैं। चीन-पाकिस्तान संबंध रक्षा, बुनियादी ढांचे और रणनीतिक सहयोग तक फैले हुए हैं। पाकिस्तान के साथ चीन की निकटता भारत के सुरक्षा समीकरण को सीधे प्रभावित करती है। यही वजह है कि भारत चीन के साथ संवाद और आर्थिक संपर्क बढ़ाते हुए भी बीजिंग की पाकिस्तान नीति तथा दक्षिण एशिया में उसकी रणनीतिक गतिविधियों पर करीबी नजर रखता है।
नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में चीन का प्रभाव भी चुनौती
भारत के लिए चुनौती केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों में चीन का बढ़ता आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव भी नई दिल्ली के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा है। चीन बुनियादी ढांचे, निवेश और संपर्क परियोजनाओं के माध्यम से दक्षिण एशिया में अपनी मौजूदगी मजबूत कर रहा है। ऐसे में भारत के लिए चीन के साथ संबंध सुधारना एक तरफ जरूरी कूटनीतिक प्रयास है, तो दूसरी तरफ अपनी सुरक्षा और पड़ोसी नीति को लेकर सतर्क रहना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
ब्रिक्स में भारत-चीन संबंधों की असली परीक्षा
ब्रिक्स भारत और चीन के लिए संवाद का एक अहम मंच है, लेकिन दोनों की प्राथमिकताएं पूरी तरह समान नहीं हैं। चीन और रूस ब्रिक्स को पश्चिमी प्रभुत्व के विकल्प के रूप में अधिक आक्रामक तरीके से देखते हैं, जबकि भारत इसे गैर-पश्चिमी मंच मानते हुए अमेरिका और यूरोप के साथ अपने संबंधों को भी संतुलित रखना चाहता है। ऐसे में दिल्ली में हो रहा शिखर सम्मेलन भारत-चीन रिश्तों के साथ-साथ रूस की भूमिका की भी परीक्षा है। रूस साझा संपर्क सूत्र बन सकता है, लेकिन दोनों देशों के बीच स्थायी भरोसा अंततः सीधे भारत-चीन संवाद से ही बनेगा।