अटलांटा. अमेरिका के अटलांटा में आयोजित जी-20 विदेश मंत्रियों की बैठक के दूसरे पूर्ण सत्र में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक ऊर्जा संकट और ऊर्जा बाजार में बढ़ती अनिश्चितताओं का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि ऊर्जा व्यापार और उससे जुड़े बुनियादी ढांचे पर जानबूझकर किए जा रहे हमले कीमतों को बंधक बनाने की सोची-समझी रणनीति हैं। जयशंकर ने आगाह किया कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में बाधाओं, प्रतिबंधों और आपूर्ति मार्गों में रुकावटों के कारण लगातार विकृतियां पैदा हो रही हैं। इनका प्रभाव केवल तेल और गैस की उपलब्धता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार और आम लोगों की लागत पर भी पड़ता है। उन्होंने विशेष रूप से कम आय वाले देशों की स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि ऊर्जा बाजार में पैदा हो रही उथल-पुथल के बीच उनकी कठिनाइयों के प्रति पर्याप्त संवेदनशीलता दिखाई नहीं दे रही है।
ऊर्जा ढांचे पर हमले कीमतों को नियंत्रित करने की रणनीति
जयशंकर ने अपने वक्तव्य में कहा कि ऊर्जा व्यापार और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाकर किए जा रहे हमले महज अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे ऊर्जा कीमतों को दबाव में रखने की सोची-समझी रणनीति दिखाई देती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि तेल और गैस की आपूर्ति से जुड़े ढांचे पर हमलों का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में दूर तक पहुंचता है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान ऊर्जा प्रतिष्ठानों तथा तेल-गैस ले जाने वाले जहाजों पर हमलों ने आपूर्ति की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं। ऐसे घटनाक्रम से बाजार में अनिश्चितता बढ़ती है और ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव का खतरा पैदा होता है। भारत का रुख इस संदर्भ में ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता, सुरक्षित व्यापार मार्गों और अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्थिरता के महत्व को रेखांकित करता है।
प्रतिबंधों और आपूर्ति मार्गों की बाधाओं पर सवाल
विदेश मंत्री ने कहा कि ऊर्जा बाजार में बाधाओं, प्रतिबंधों और महत्वपूर्ण आपूर्ति मार्गों पर रुकावटों के कारण पैदा होने वाली विकृतियां लगातार अधिक जटिल और व्यापक होती जा रही हैं। उनके अनुसार, इनका प्रभाव अब अधिक बार दिखाई दे रहा है और इसके परिणाम पहले की तुलना में कहीं अधिक दूरगामी हो सकते हैं। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका ने ईरानी तेल की बिक्री पर प्रतिबंध लगाए हुए हैं और हाल में रूस से जुड़े प्रतिबंधों में कुछ छूट देने का फैसला भी किया है। इन नीतिगत कदमों के बीच वैश्विक ऊर्जा व्यापार की दिशा और आपूर्ति की उपलब्धता को लेकर नए सवाल उठे हैं। जयशंकर की टिप्पणी का केंद्र यह था कि ऊर्जा बाजार को राजनीतिक और रणनीतिक फैसलों के कारण प्रभावित करने से अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में असंतुलन पैदा हो सकता है, जिसका बोझ कई देशों को उठाना पड़ता है।
कम आय वाले देशों पर पड़ता है सबसे गंभीर असर
जयशंकर ने कहा कि ऊर्जा बाजार में पैदा हो रही बाधाओं और अस्थिरता के बीच कम आय वाले देशों की कठिन परिस्थितियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। ऊर्जा की कीमतों में तेजी का असर ऐसे देशों के आयात बिल, परिवहन लागत, बिजली उत्पादन और घरेलू महंगाई पर पड़ सकता है। जिन देशों की अर्थव्यवस्था आयातित तेल और गैस पर अधिक निर्भर है, उनके लिए आपूर्ति में रुकावट या कीमतों में अचानक वृद्धि गंभीर आर्थिक चुनौती बन सकती है। इसका असर खाद्य पदार्थों के उत्पादन और वितरण से लेकर उद्योगों तथा आम उपभोक्ताओं तक पहुंचता है। विदेश मंत्री ने इस संदर्भ में वैश्विक बाजार की परस्पर निर्भरता को समझने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका संदेश था कि ऊर्जा से जुड़े फैसलों और संघर्षों के प्रभावों का आकलन केवल किसी एक देश या क्षेत्र तक सीमित रखकर नहीं किया जा सकता।
तेल और गैस के बीच सुविधानुसार अंतर करने पर आपत्ति
विदेश मंत्री ने ऊर्जा बाजार में तेल और गैस के साथ अलग-अलग मानदंड अपनाए जाने पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि दोनों ऊर्जा स्रोतों के बीच सुविधानुसार भेद किए जा रहे हैं और चुनिंदा मामलों में दी जा रही छूट अपने आप में बहुत कुछ स्पष्ट करती है। उनका संकेत इस बात की ओर था कि वैश्विक ऊर्जा व्यापार के नियमों और प्रतिबंधों को लागू करते समय समानता तथा पारदर्शिता का ध्यान रखा जाना चाहिए। जयशंकर ने आगाह किया कि वैश्वीकृत बाजार में एक देश या क्षेत्र में लिया गया फैसला दूसरे देशों की आपूर्ति, कीमतों और आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है। तेल और गैस के बाजार अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि अनेक स्तरों पर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए किसी एक क्षेत्र में प्रतिबंध, छूट या आपूर्ति संबंधी बदलाव के व्यापक परिणामों को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा।
वैश्विक ऊर्जा बाजार में संतुलन और सहयोग की जरूरत
जी-20 मंच पर जयशंकर की टिप्पणियों ने ऊर्जा सुरक्षा को अंतरराष्ट्रीय आर्थिक स्थिरता से जोड़कर देखने की जरूरत सामने रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऊर्जा व्यापार और बुनियादी ढांचे की सुरक्षा, आपूर्ति मार्गों की निरंतरता तथा बाजार में निष्पक्षता वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। पश्चिम एशिया और रूस-यूक्रेन संघर्ष के कारण ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियां पहले से अधिक जटिल हो गई हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने यह चुनौती है कि ऊर्जा बाजार को संघर्षों और चुनिंदा प्रतिबंधों के प्रभाव से बचाने के लिए सहयोग तथा संतुलित नीतियों को प्राथमिकता दी जाए। भारत की ओर से उठाया गया मुद्दा विशेष रूप से उन विकासशील और कम आय वाले देशों की चिंताओं को सामने लाता है, जिनके पास ऊर्जा कीमतों में अचानक बढ़ोतरी का सामना करने के लिए सीमित आर्थिक गुंजाइश होती है।