नई दिल्ली | दिल्ली हाई कोर्ट ने अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनौत के व्यक्तित्व अधिकारों की सुरक्षा को लेकर अहम अंतरिम आदेश जारी किया है। अदालत ने उनकी अनुमति के बिना उनके नाम, तस्वीर, आवाज और व्यक्तित्व से जुड़ी अन्य विशेषताओं के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। इस आदेश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से तैयार डीपफेक, मॉर्फ किए गए वीडियो, मनगढ़ंत भाषण और भ्रामक विज्ञापन भी शामिल हैं। यह आदेश डिजिटल प्लेटफॉर्म पर किसी व्यक्ति की पहचान और प्रतिष्ठा के कथित दुरुपयोग से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मेटा को आपत्तिजनक कंटेंट हटाने का निर्देश
न्यायमूर्ति विकास महाजन की पीठ ने अंतरिम आदेश में मेटा प्लेटफॉर्म्स को कंगना रनौत की ओर से चिह्नित उल्लंघनकारी सामग्री हटाने और उसके दोबारा प्रसार को रोकने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और दूरसंचार विभाग को भी आवश्यक कदम उठाने के लिए कहा है। निर्देशों के तहत संबंधित मंत्रालयों को इंटरनेट और दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के माध्यम से निर्धारित समयसीमा में उल्लंघनकारी वेबसाइटों तक पहुंच रोकने के लिए जरूरी कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा गया है। इसका उद्देश्य ऐसी सामग्री के ऑनलाइन प्रसार को सीमित करना है, जो बिना अनुमति किसी व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल करती है।
नाम, तस्वीर और आवाज पर व्यक्तित्व अधिकार
अदालत ने व्यक्तित्व अधिकारों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि व्यक्ति को अपनी पहचान और उससे जुड़ी विशेषताओं के व्यावसायिक इस्तेमाल को नियंत्रित करने का अधिकार है। इसमें नाम, तस्वीर, आवाज और व्यक्तित्व से जुड़ी अन्य पहचान योग्य विशेषताएं शामिल हैं। इस तरह की सुरक्षा का उद्देश्य किसी व्यक्ति की लोकप्रियता या पहचान का उसकी अनुमति के बिना व्यावसायिक लाभ के लिए इस्तेमाल रोकना भी है। आदेश में AI से तैयार या डिजिटल रूप से बदली गई सामग्री से सुरक्षा को भी शामिल किया गया है, खासकर ऐसी सामग्री से जो व्यक्ति की छवि और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकती है।
AI डीपफेक और मॉर्फ किए गए वीडियो भी आदेश के दायरे में
मामले में सामने आई कथित सामग्री में AI से तैयार वीडियो, बदली गई तस्वीरें, मनगढ़ंत भाषण और यौन प्रकृति के डीपफेक शामिल बताए गए हैं। ऐसी सामग्री में किसी व्यक्ति को ऐसी परिस्थितियों में दिखाया जा सकता है, जिनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता। अदालत ने रिकॉर्ड पर रखी गई सामग्री पर विचार करने के बाद कथित उल्लंघनकारी कंटेंट को हटाने की आवश्यकता स्वीकार की। आदेश का दायरा केवल तस्वीरों तक सीमित नहीं है, बल्कि आवाज की नकल, नकली भाषण और डिजिटल माध्यम से तैयार अन्य भ्रामक सामग्री भी इसमें शामिल हो सकती है।
कंगना रनौत ने मुकदमे में क्या आरोप लगाए?
कंगना रनौत की ओर से दायर मुकदमे में आरोप लगाया गया कि कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और वेबसाइटों पर उनके बारे में मनगढ़ंत बयान, मॉर्फ की गई तस्वीरें और छेड़छाड़ किए गए वीडियो प्रसारित किए जा रहे थे। याचिका के अनुसार, कुछ सामग्री में उन्हें अनुचित परिस्थितियों में दिखाया गया, जबकि कुछ में ऐसे बयान देते या गतिविधियों में शामिल दिखाया गया, जो उन्होंने वास्तव में नहीं किए थे। उन्होंने दलील दी कि इस तरह की सामग्री उनके व्यक्तित्व, प्रचार, पहचान और प्रतिष्ठा से जुड़े अधिकारों का उल्लंघन करती है। साथ ही, ऐसी सामग्री जनता को गुमराह कर सकती है और उनकी सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचा सकती है। ये आरोप मुकदमे में पक्षकार की ओर से रखे गए दावे हैं।
डिजिटल कंटेंट और AI के दुरुपयोग पर अहम सवाल
AI तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के साथ डीपफेक और डिजिटल रूप से बदली गई सामग्री को लेकर कानूनी चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। किसी व्यक्ति की तस्वीर, आवाज या वीडियो का इस्तेमाल करके भ्रामक सामग्री तैयार करना उसकी निजता, पहचान और प्रतिष्ठा से जुड़े अधिकारों पर असर डाल सकता है। कंगना रनौत के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट का अंतरिम आदेश इस बात को रेखांकित करता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर किसी की पहचान का कथित दुरुपयोग होने पर कानूनी संरक्षण मांगा जा सकता है। हालांकि, यह अंतरिम आदेश है और मामले की आगे की सुनवाई में संबंधित पक्षों की दलीलों तथा अदालत के आगामी निर्देशों से इसकी स्थिति स्पष्ट होगी।