लखनऊ | उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) अपने जातीय समीकरणों को मजबूत करने में जुट गई है। गैर-जाटव दलित मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए पार्टी अब पासी समाज पर विशेष ध्यान दे रही है। पूर्व केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर की नाराजगी और पासी समाज में बढ़ती बेचैनी को दूर करना भाजपा की रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। इसी सिलसिले में प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े ने 14 अक्टूबर को पार्टी मुख्यालय में पासी समाज के जनप्रतिनिधियों और पदाधिकारियों की बैठक बुलाई थी, लेकिन फिलहाल इसे टाल दिया गया है। अब यह बैठक अगले सप्ताह आयोजित किए जाने की बात कही जा रही है।
उत्तर प्रदेश की 85 सीटों पर निर्णायक भूमिका का दावा
पासी समाज उत्तर प्रदेश के प्रमुख दलित समुदायों में शामिल है। अनुसूचित जाति वर्ग में जाटव समाज के बाद इसकी बड़ी आबादी मानी जाती है। अवध, गोरखपुर, कानपुर और काशी क्षेत्र में पासी समाज की उल्लेखनीय उपस्थिति है। भाजपा नेताओं के आकलन के अनुसार, प्रदेश की करीब 85 विधानसभा सीटों पर पासी मतदाता निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं, जबकि लगभग 150 सीटों पर उनका राजनीतिक प्रभाव माना जाता है। ऐसे में इस समुदाय का समर्थन आगामी चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
कौशल किशोर की नाराजगी से भाजपा की चिंता बढ़ी
भाजपा ने हाल के समय में पासी समाज के नेताओं को संगठन और सत्ता में प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की है। प्रियंका रावत को राज्यसभा भेजने और कृष्णा पासवान को प्रदेश सरकार में मंत्री बनाने जैसे कदमों को इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। इसके अलावा अशोक रावत और उपेंद्र रावत सहित अन्य नेताओं को संगठन में जिम्मेदारी देने की बात भी सामने आई है। हालांकि, पूर्व केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर की नाराजगी पार्टी के लिए चुनौती बनी हुई है। भाजपा नेतृत्व की कोशिश है कि समुदाय के प्रमुख नेताओं के बीच समन्वय बढ़ाया जाए और समाज से जुड़े मुद्दों पर संवाद के जरिए असंतोष दूर किया जाए।
भाजपा और सपा के बीच प्रतिनिधित्व की सियासी होड़
पासी समाज के नेताओं को अपने साथ जोड़ने के मामले में भाजपा और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा दिखाई दे रही है। उपलब्ध राजनीतिक समीकरणों के अनुसार, भाजपा के पास जयप्रकाश रावत, अशोक रावत और कमलेश पासवान जैसे नेता हैं, जबकि सपा की ओर से अवधेश प्रसाद, आरके चौधरी, प्रिया सरोज, पुष्पेंद्र सरोज और दारोगा प्रसाद सरोज जैसे नेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। फैजाबाद के सांसद अवधेश प्रसाद के जरिए सपा दलित राजनीति में अपनी हिस्सेदारी को मजबूत करने का संदेश देती रही है। पार्टी ने इंद्रजीत सरोज, आरके चौधरी, पुष्पेंद्र सरोज और प्रिया सरोज सहित कई नेताओं को सक्रिय कर रखा है। इससे पासी समाज और व्यापक गैर-जाटव दलित मतदाताओं के बीच राजनीतिक समर्थन जुटाने की प्रतिस्पर्धा तेज होने के संकेत मिलते हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा की रणनीति पर जोर
भाजपा ने पिछले चुनावों में गैर-जाटव दलित मतदाताओं के बीच समर्थन बढ़ाने की रणनीति पर काम किया था। पार्टी को इस रणनीति से पहले चुनावों में लाभ भी मिला। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण ने भाजपा के सामने नई राजनीतिक चुनौती पेश की। इसके बाद भाजपा के लिए दलित समुदायों के बीच अपनी पकड़ मजबूत रखना और सामाजिक प्रतिनिधित्व का संतुलन साधना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। पासी समाज के जनप्रतिनिधियों और पदाधिकारियों के साथ प्रस्तावित बैठक को भी इसी व्यापक राजनीतिक प्रयास का हिस्सा माना जा रहा है।
आगामी चुनाव में कितना असर डालेगा पासी समाज?
आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा की चुनौती केवल नेताओं को पद देने तक सीमित नहीं है। पार्टी को समुदाय के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच, स्थानीय मुद्दों और प्रतिनिधित्व को लेकर उठने वाली चिंताओं पर भी ध्यान देना होगा। दूसरी ओर, सपा अपने पीडीए समीकरण के जरिए दलित मतदाताओं के बीच समर्थन बढ़ाने की कोशिश कर रही है। ऐसे में पासी समाज को लेकर दोनों दलों की रणनीति उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। भाजपा की प्रस्तावित बैठक कब होती है और उसके बाद पार्टी समुदाय के लिए क्या कदम उठाती है, इस पर राजनीतिक नजरें रहेंगी।