देश में तेजी से बढ़ रहे राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क के साथ पर्यावरण संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन गया है। इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने पहली बार राष्ट्रीय राजमार्ग ग्रीन कवर इंडेक्स जारी किया है। यह सूचकांक राजमार्गों के किनारे मौजूद हरित आवरण की वैज्ञानिक और तकनीकी पद्धति से माप करने के लिए तैयार किया गया है। इसके माध्यम से सड़क किनारे वृक्षारोपण और वनस्पति की वास्तविक स्थिति का व्यापक स्तर पर आकलन किया जा सकेगा।
उपग्रह तकनीक से किया गया आकलन
इस सूचकांक को तैयार करने के लिए उपग्रह आधारित आधुनिक तकनीक का उपयोग किया गया है। उच्च गुणवत्ता वाले उपग्रह सेंसर के माध्यम से राजमार्गों के दोनों ओर मौजूद वनस्पति में उपस्थित क्लोरोफिल की मात्रा का विश्लेषण किया गया। इस तकनीक से यह पता लगाया जा सकता है कि सड़क के किनारे कितनी हरियाली मौजूद है और किस क्षेत्र में वृक्षारोपण की स्थिति बेहतर या कमजोर है। इस वैज्ञानिक पद्धति से प्राप्त आंकड़े भविष्य की पर्यावरणीय योजनाओं के लिए अत्यंत उपयोगी माने जा रहे हैं।
अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र के सहयोग से तैयार हुआ ढांचा
इस परियोजना को विकसित करने के लिए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने अंतरिक्ष अनुसंधान से जुड़े राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र के साथ सहयोग किया। दोनों संस्थानों के बीच जनवरी 2024 में एक समझौता किया गया था, जिसके तहत राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे लगाए गए पौधों और हरित आवरण के आकलन के लिए एक वैज्ञानिक और मात्रात्मक ढांचा विकसित किया गया। इस सहयोग से प्राप्त तकनीकी विशेषज्ञता ने पूरे अध्ययन को अधिक सटीक और विश्वसनीय बनाया है।
पहले चरण में 30 हजार किलोमीटर राजमार्ग का अध्ययन
ग्रीन कवर इंडेक्स के पहले आकलन चक्र में देश के 24 राज्यों में लगभग 30 हजार किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग मार्गों को शामिल किया गया। यह अध्ययन जुलाई से दिसंबर 2024 के बीच किया गया, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों में मौजूद हरित आवरण का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया। इस प्रक्रिया के माध्यम से यह भी समझने का प्रयास किया गया कि किन मार्गों पर हरियाली अपेक्षाकृत अधिक है और किन क्षेत्रों में वृक्षारोपण की आवश्यकता अधिक है।
भविष्य में निगरानी और सुधार में मिलेगी मदद
इस सूचकांक का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य यह है कि हर वर्ष उसी राजमार्ग खंड पर दोबारा आकलन किया जा सके और वर्ष दर वर्ष होने वाले बदलावों को दर्ज किया जा सके। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि किन क्षेत्रों में हरियाली में सुधार हुआ है और कहां अतिरिक्त प्रयासों की आवश्यकता है। साथ ही यह व्यवस्था राजमार्गों के विभिन्न हिस्सों की तुलना और रैंकिंग करने की सुविधा भी प्रदान करेगी, जिससे कम हरित आवरण वाले क्षेत्रों की पहचान कर वहां वृक्षारोपण और देखभाल के प्रयासों को प्राथमिकता दी जा सकेगी।
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