भारतीय मुद्रा ने शुक्रवार को एक नया निचला स्तर छूते हुए अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 93 के पार पहुंचकर ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की। शुरुआती कारोबार में रुपया 93.08 के स्तर तक फिसल गया, जो अब तक का सबसे कमजोर स्तर है। इससे पहले भी रुपया लगातार दबाव में रहा था और हाल के दिनों में इसमें गिरावट का सिलसिला जारी था।
वैश्विक तनाव का सीधा असर
पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का सीधा प्रभाव मुद्रा बाजार पर देखने को मिल रहा है। इस क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ने से निवेशकों में अनिश्चितता का माहौल बन गया है, जिसका असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर पड़ रहा है। भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए यह स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण बन जाती है।
डॉलर की मजबूती बनी मुख्य वजह
अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की मजबूती ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया है। वैश्विक स्तर पर निवेशक सुरक्षित विकल्प के रूप में डॉलर की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे अन्य मुद्राओं की तुलना में इसकी मांग बढ़ रही है। यही कारण है कि भारतीय मुद्रा कमजोर होती जा रही है।
कच्चे तेल की कीमतों का दबाव
ऊंची कच्चे तेल की कीमतें भी रुपये की गिरावट का प्रमुख कारण बनी हैं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, ऐसे में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से व्यापार घाटा बढ़ता है और मुद्रा पर दबाव पड़ता है। यह स्थिति अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है।
विदेशी निवेश की निकासी
विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा लगातार पूंजी निकासी भी रुपये की कमजोरी को बढ़ा रही है। जब विदेशी निवेशक बाजार से पैसा निकालते हैं, तो डॉलर की मांग बढ़ती है और स्थानीय मुद्रा कमजोर होती है। हाल के दिनों में बड़ी मात्रा में निवेश निकासी ने बाजार की स्थिति को और अस्थिर कर दिया है।
आगे की राह और संभावनाए
वर्तमान परिस्थितियों में रुपया आगे भी दबाव में रह सकता है, हालांकि केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप से कुछ हद तक स्थिरता बनाए रखने की कोशिश की जा रही है। आने वाले समय में वैश्विक हालात और तेल की कीमतें ही तय करेंगी कि मुद्रा बाजार किस दिशा में आगे बढ़ेगा।
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