दुनिया की जलवायु को प्रभावित करने वाली सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक घटनाओं में एल नीन्यो का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। यह घटना प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्री सतह के असामान्य रूप से गर्म होने से जुड़ी होती है। सामान्य परिस्थितियों में पूर्व से पश्चिम की ओर बहने वाली व्यापारिक हवाएं गर्म पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की दिशा में धकेलती हैं, लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं तो गर्म पानी वापस दक्षिण अमेरिकी तटों की ओर फैलने लगता है। इसी स्थिति को एल नीन्यो कहा जाता है। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक मौसम चक्र प्रभावित होता है और कई क्षेत्रों में वर्षा तथा तापमान के पैटर्न बदल जाते हैं।
जब एल नीन्यो बन जाता है ‘सुपर एल नीन्यो’
वैज्ञानिक भाषा में जब समुद्री सतह का तापमान सामान्य स्तर से बहुत अधिक बढ़ जाता है और उसका प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है, तब उसे सुपर एल नीन्यो कहा जाता है। यह सामान्य एल नीन्यो की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली होता है। इतिहास में 1982-83, 1997-98 और 2015-16 के दौरान दर्ज सुपर एल नीन्यो ने दुनिया भर में भीषण गर्मी, सूखा, बाढ़ और कृषि संकट जैसी परिस्थितियां पैदा की थीं। यही कारण है कि जब भी महासागरों के तापमान में असामान्य वृद्धि दिखाई देती है, वैज्ञानिक समुदाय विशेष सतर्क हो जाता है।
महासागर की गर्मी कैसे बदल देती है पूरी दुनिया का मौसम
समुद्र और वातावरण एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। महासागर की सतह गर्म होने पर वायुमंडलीय दबाव, हवाओं की दिशा और बादलों के निर्माण की प्रक्रिया प्रभावित होती है। परिणामस्वरूप कहीं सामान्य से अधिक बारिश होती है तो कहीं वर्षा में भारी कमी आ जाती है। एल नीन्यो के दौरान दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में बाढ़ जैसी स्थितियां बन सकती हैं, जबकि एशिया और ऑस्ट्रेलिया के कई क्षेत्रों में सूखे का खतरा बढ़ जाता है। यही वजह है कि प्रशांत महासागर में होने वाला परिवर्तन हजारों किलोमीटर दूर स्थित देशों के मौसम को भी प्रभावित कर देता है।
भारत के मानसून पर क्यों पड़ता है असर?
भारत की कृषि और जल संसाधन व्यवस्था काफी हद तक दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर करती है। मानसूनी हवाएं समुद्र से नमी लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में वर्षा करती हैं। एल नीन्यो की स्थिति में वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण प्रभावित होता है, जिससे मानसूनी प्रणाली कमजोर पड़ सकती है। कई बार इसका परिणाम सामान्य से कम वर्षा, लंबे शुष्क अंतराल और कृषि उत्पादन में कमी के रूप में सामने आता है। हालांकि हर एल नीन्यो वर्ष में एक जैसा प्रभाव नहीं होता, फिर भी मौसम वैज्ञानिक इसे भारतीय मानसून के लिए महत्वपूर्ण कारक मानते हैं।
गर्मी और लू की घटनाएं क्यों बढ़ सकती हैं?
जब बादलों की संख्या कम होती है और वर्षा में कमी आती है, तब सूर्य की किरणें सीधे धरती की सतह को अधिक गर्म करती हैं। इससे तापमान तेजी से बढ़ता है और लू की घटनाएं अधिक तीव्र हो सकती हैं। उत्तर भारत, मध्य भारत और पश्चिमी क्षेत्रों में लंबे समय तक चलने वाली गर्म हवाएं जनजीवन को प्रभावित कर सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शक्तिशाली एल नीन्यो और वैश्विक तापवृद्धि का प्रभाव एक साथ सक्रिय हो जाए, तो अत्यधिक तापमान वाले दिनों की संख्या बढ़ सकती है और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम भी बढ़ सकते हैं।
क्या सचमुच टूट जाएंगे सारे रिकॉर्ड?
वैज्ञानिक समुदाय भविष्यवाणियों को लेकर सावधानी बरतता है। मौसम और जलवायु कई कारकों से प्रभावित होते हैं, इसलिए किसी एक घटना के आधार पर निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं माना जाता। हालांकि यह सच है कि वैश्विक तापमान पिछले कई वर्षों से लगातार बढ़ रहा है और महासागरों में रिकॉर्ड स्तर की गर्मी दर्ज की जा रही है। यदि शक्तिशाली एल नीन्यो की स्थिति विकसित होती है, तो दुनिया के अनेक हिस्सों में तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना बढ़ सकती है। फिर भी यह कहना कि सभी रिकॉर्ड निश्चित रूप से टूट जाएंगे, अभी वैज्ञानिक रूप से स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चिंता
आज दुनिया जिस सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौती का सामना कर रही है, वह जलवायु परिवर्तन है। जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग, औद्योगिक उत्सर्जन और वनों की कटाई के कारण वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ रही है। इसके परिणामस्वरूप पृथ्वी का औसत तापमान लगातार ऊपर जा रहा है। ऐसे में यदि एल नीन्यो जैसी प्राकृतिक घटनाएं भी सक्रिय हो जाएं, तो उनका प्रभाव और अधिक गंभीर महसूस हो सकता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन और महासागरीय तापमान पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
बढ़ती गर्मी से निपटने के लिए क्या करें?
विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक गर्मी की परिस्थितियों में पर्याप्त पानी पीना, धूप के चरम समय में बाहर निकलने से बचना, हल्के और सूती वस्त्र पहनना तथा बुजुर्गों, बच्चों और रोगियों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। साथ ही जल संरक्षण, वृक्षारोपण और पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली अपनाना दीर्घकालिक समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। बदलती जलवायु परिस्थितियों के बीच जागरूकता और तैयारी ही सबसे प्रभावी सुरक्षा कवच साबित हो सकती है।