उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 के उस प्रावधान को निरस्त कर दिया, जिसमें गोद लेने वाली माताओं को केवल तीन महीने से कम आयु के बच्चों को अपनाने पर ही मातृत्व अवकाश देने की सीमा तय की गई थी। न्यायालय ने इसे असंवैधानिक बताते हुए स्पष्ट किया कि मातृत्व अवकाश का अधिकार सभी दत्तक माताओं को समान रूप से मिलना चाहिए।
भेदभावपूर्ण प्रावधान पर सख्त टिप्पणी
न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और आर महादेवन की पीठ ने इस प्रावधान को भेदभावपूर्ण करार दिया। न्यायालय ने कहा कि आयु के आधार पर इस प्रकार का वर्गीकरण संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करता है। यह निर्णय समानता और गरिमा के अधिकार को और अधिक मजबूत करता है।
दत्तक मातृत्व को मिला समान दर्जा
न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट रूप से कहा कि गोद लेना भी मातृत्व का उतना ही वैध और महत्वपूर्ण मार्ग है जितना कि जैविक जन्म। ऐसे में दत्तक माताओं के साथ किसी प्रकार का भेदभाव स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह निर्णय समाज में दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया को भी सम्मान और प्रोत्साहन देने वाला माना जा रहा है।
मातृत्व संरक्षण के उद्देश्य पर जोर
न्यायालय ने कहा कि मातृत्व अवकाश का मूल उद्देश्य बच्चे की देखभाल, भावनात्मक जुड़ाव और परिवार में उसके समुचित समावेशन को सुनिश्चित करना है। ऐसे में बच्चे की आयु के आधार पर इस अधिकार को सीमित करना तर्कसंगत नहीं है। न्यायमूर्ति पारदीवाला ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान संवैधानिक कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
पितृत्व अवकाश पर भी विचार की जरूरत
इस फैसले के दौरान न्यायालय ने केंद्र सरकार को यह सुझाव भी दिया कि पितृत्व अवकाश को भी एक सामाजिक कल्याण उपाय के रूप में लागू करने पर विचार किया जाए। इससे देखभाल की जिम्मेदारी केवल महिलाओं तक सीमित नहीं रहेगी और समाज में अधिक संतुलित और समावेशी दृष्टिकोण विकसित होगा।
समावेशी समाज की ओर बड़ा कदम
यह निर्णय न केवल दत्तक माताओं के अधिकारों को सुदृढ़ करता है, बल्कि एक अधिक संवेदनशील और समानतापूर्ण समाज की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। इससे कार्यस्थलों पर महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव आने की उम्मीद है और परिवार व्यवस्था में संतुलन को भी बढ़ावा मिलेगा।
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