नई दिल्ली. सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को आरक्षण व्यवस्था से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि कोई व्यक्ति हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम या किसी अन्य धर्म को अपनाने के बाद केवल धर्म परिवर्तन से पहले की सामाजिक पिछड़ेपन की स्थिति के आधार पर पिछड़े वर्ग के आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति चंद्रशेखर की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए संविधान के अनुच्छेद सोलह के चौथे खंड की व्याख्या की। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सामाजिक पिछड़ापन किसी व्यक्ति की वर्तमान सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा होता है, न कि उसके पिछले धर्म या जाति से। इस निर्णय से आरक्षण की मूल भावना को बनाए रखने का प्रयास किया गया है ताकि वास्तविक रूप से पिछड़े वर्गों को ही लाभ मिल सके। न्यायालय का यह रुख लंबे समय से चले आ रहे विवादों पर अंकुश लगाने वाला माना जा रहा है।
मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय को पूर्ण समर्थन
सर्वोच्च न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस फैसले को बरकरार रखा जिसमें तमिलनाडु सरकार के एक आदेश को रद्द कर दिया गया था। उस आदेश में पिछड़े वर्ग, अति पिछड़े वर्ग और अनुसूचित जातियों से आने वाले लोगों को इस्लाम अपनाने के बाद भी पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में शामिल करने की अनुमति दी गई थी। उच्च न्यायालय ने इस आदेश को असंवैधानिक करार देते हुए कहा था कि धर्म परिवर्तन मात्र से किसी व्यक्ति को नई श्रेणी का लाभ नहीं दिया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने इस तर्क को सही ठहराते हुए कहा कि सरकार का ऐसा कोई भी आदेश संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है। इस पूरे प्रकरण में न्यायालय ने आरक्षण की पात्रता को धर्म परिवर्तन से जोड़ने के प्रयास को अस्वीकार कर दिया। इससे स्पष्ट हुआ कि आरक्षण व्यवस्था सामाजिक न्याय का साधन है, न कि धर्म परिवर्तन को प्रोत्साहित करने का माध्यम।
धर्म परिवर्तन से पहले की सामाजिक स्थिति का दावा अस्वीकार्य
न्यायालय ने अपने निर्णय में साफ शब्दों में कहा कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था से गैर-हिंदू सामाजिक व्यवस्था में जाने वाला व्यक्ति केवल अपने धर्म परिवर्तन से पहले की सामाजिक पिछड़ेपन की स्थिति के आधार पर संविधान के अनुच्छेद सोलह के चौथे खंड के तहत आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। पहले की सामाजिक व्यवस्था में झेली गई कठिनाइयों को अपने आप आगे बढ़ाकर नए धर्म में किसी पिछड़े वर्ग का दर्जा हासिल करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। यह सिद्धांत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सामाजिक पिछड़ापन समय और परिस्थितियों के साथ बदलता रहता है। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि आरक्षण का लाभ वर्तमान में वास्तविक रूप से पिछड़े वर्गों को ही मिलना चाहिए। इस व्याख्या से यह सुनिश्चित होता है कि कोई भी व्यक्ति धर्म परिवर्तन का सहारा लेकर आरक्षण व्यवस्था का दुरुपयोग न कर सके।
अनुसूचित जाति के दर्जे पर महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण
सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति के दर्जे के संबंध में भी स्पष्ट टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि संविधान अनुसूचित जाति आदेश एक हजार नौ सौ पचास में यह प्रावधान है कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। ऐसे में इन धर्मों के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाने पर व्यक्ति अपने पहले की जाति से जुड़ा अनुसूचित जाति का दर्जा खो देता है और वह आरक्षण का लाभ भी नहीं मांग सकता। यह प्रावधान इसलिए बनाया गया था ताकि अनुसूचित जातियों को उनके ऐतिहासिक सामाजिक उत्पीड़न के आधार पर विशेष संरक्षण मिल सके। धर्म परिवर्तन के बाद यह संरक्षण स्वतः समाप्त हो जाता है क्योंकि नई धार्मिक व्यवस्था में वही सामाजिक संरचना नहीं रहती। न्यायालय का यह स्पष्टीकरण लंबे समय से चले आ रहे भ्रम को दूर करता है।
पुनर्धर्म परिवर्तन पर भी कोई स्वतः लाभ नहीं
न्यायालय ने इस बात को भी स्पष्ट किया कि अगर कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन के बाद दोबारा हिंदू धर्म अपना लेता है तो उसे पहले वाला पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जाति का दर्जा अपने आप वापस नहीं मिल जाता। पुनर्धर्म परिवर्तन की स्थिति में भी व्यक्ति को नई स्थिति के अनुसार अपनी पात्रता सिद्ध करनी होगी। यह प्रावधान इसलिए आवश्यक है ताकि आरक्षण व्यवस्था में कोई भी व्यक्ति बार-बार धर्म परिवर्तन करके लाभ न उठा सके। न्यायालय ने इस मुद्दे पर कठोर रुख अपनाते हुए कहा कि सामाजिक न्याय की व्यवस्था को व्यक्तिगत सुविधा का साधन नहीं बनाया जा सकता। इस स्पष्टीकरण से यह सुनिश्चित होता है कि आरक्षण का लाभ केवल वास्तविक और स्थायी रूप से पिछड़े वर्गों तक ही सीमित रहे। न्यायालय का यह दृष्टिकोण संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने वाला है।
आरक्षण व्यवस्था की मूल भावना की रक्षा
इस पूरे निर्णय के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण व्यवस्था की मूल भावना को रेखांकित किया है। आरक्षण सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाने का एक संवैधानिक साधन है। इसे धर्म परिवर्तन जैसे व्यक्तिगत निर्णयों से जोड़कर इसकी गरिमा को कम नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पिछड़ापन किसी व्यक्ति की वर्तमान सामाजिक स्थिति से जुड़ा होता है और इसे पिछले धर्म या जाति के आधार पर स्वतः स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। इस फैसले से उन तमाम प्रयासों पर अंकुश लगेगा जो धर्म परिवर्तन को आरक्षण का माध्यम बनाने की कोशिश कर रहे थे। इससे सामाजिक न्याय की व्यवस्था और अधिक पारदर्शी तथा निष्पक्ष बनेगी। न्यायालय का यह रुख लंबे समय तक आरक्षण नीति के सही क्रियान्वयन में सहायक सिद्ध होगा।