नई दिल्ली - सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह (एक से अधिक विवाह) की प्रथा को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। अदालत ने इस मामले में नोटिस जारी करते हुए केंद्र से अपना पक्ष रखने को कहा है। यह मामला अब पहले से लंबित समान याचिकाओं के साथ सुना जाएगा।
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने दायर की याचिका
यह याचिका महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली जाकिया सोमन, नूरजहां सफिया नियाज समेत अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर की गई है। इसमें दावा किया गया है कि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत बहुविवाह की अनुमति संविधान में दिए गए समानता और गरिमा के अधिकारों के विपरीत है।
BNS की धारा 82 लागू करने की मांग
याचिका में मांग की गई है कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 82 के प्रावधान सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू किए जाएं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बहुविवाह को लेकर किसी भी प्रकार की धार्मिक छूट समाप्त की जानी चाहिए, ताकि सभी नागरिकों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था लागू हो सके।
शरियत कानून की धारा 2 को दी चुनौती
याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) आवेदन अधिनियम, 1937 की धारा 2 की संवैधानिक वैधता पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यहप्रावधान बहुविवाह को मान्यता देता है, जिससे मुस्लिम महिलाओं को वह कानूनी सुरक्षा नहीं मिल पाती जो अन्य नागरिकों को उपलब्ध है।
महिलाओं और बच्चों के अधिकारों का उठाया मुद्दा
याचिका में कहा गया है कि बहुविवाह की प्रथा महिलाओं और बच्चों के हितों को प्रभावित करती है। इसमें केंद्र सरकार से ऐसी व्यवस्था बनाने की मांग की गई है, जिससे सभी मुस्लिम विवाह और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण हो। साथ ही पहली पत्नी और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा, वैवाहिक घर में रहने का अधिकार तथा भरण-पोषण के मामलों के त्वरित निपटारे की व्यवस्था सुनिश्चित करने की भी मांग की गई है।
संवैधानिक अधिकारों का हवाला
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि बहुविवाह की व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करती है। इसी आधार पर संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका दाखिल की गई है।
केंद्र के जवाब के बाद आगे बढ़ेगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले में केंद्र का पक्ष आने के बाद अदालत आगे की सुनवाई करेगी। इस मामले का अंतिम फैसला भविष्य में मुस्लिम व्यक्तिगत कानून और बहुविवाह से जुड़े कानूनी पहलुओं पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।