नई दिल्ली - भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह वैध और संविधान सम्मत है। कोर्ट ने माना कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण कराना भारत निर्वाचन आयोग का अधिकार और जिम्मेदारी है।
अश्विनी उपाध्याय ने फैसले का किया स्वागत
याचिकाकर्ता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने SIR प्रक्रिया में बताई गई कमियों को स्वीकार नहीं किया और माना कि चुनाव आयोग ने निष्पक्ष तरीके से प्रक्रिया पूरी कराई है। उन्होंने कहा कि उनकी मांग थी कि SIR नियमित अंतराल पर होना चाहिए और हर पांच साल में मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण किया जाना चाहिए, ताकि अवैध घुसपैठियों और विदेशी नागरिकों के नाम वोटर लिस्ट में शामिल न हों।
11 दस्तावेजों को कोर्ट ने माना उचित
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा तय किए गए 11 दस्तावेज उचित हैं और वे किसी नियम या कानून का उल्लंघन नहीं करते। अदालत ने इन दस्तावेजों के समूह को वैध और उपयुक्त माना। कोर्ट ने आधार कार्ड को लेकर भी कोई नकारात्मक टिप्पणी नहीं की। अदालत ने न तो आधार को अनिवार्य बताया और न ही उसे खारिज किया।
हटाए गए नामों की होगी जांच
अदालत ने निर्देश दिया कि जिन लोगों के नाम 2003 के SIR के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए थे, उनकी नागरिकता स्थिति की जांच उचित न्यायाधिकरणों के माध्यम से की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल SIR प्रक्रिया के दौरान किसी व्यक्ति का नाम हट जाना, यह साबित नहीं करता कि वह विदेशी नागरिक है। इसके लिए विधिक प्रक्रिया और सत्यापन जरूरी होगा।
चुनाव आयोग की प्रक्रिया को बताया निष्पक्ष
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने माना कि चुनाव आयोग ने निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से SIR प्रक्रिया पूरी की है। फैसले को चुनाव आयोग और सरकार के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, जबकि SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाने वाली याचिकाओं को अदालत ने खारिज कर दिया।