नई दिल्ली: वोटर लिस्ट (Voter List) से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने को लेकर उपजे विवाद के बीच आज सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) अपना एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाने जा रहा है। शीर्ष अदालत वोटर लिस्ट के विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision - SIR) की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना निर्णय देगी। आज, बुधवार को देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची की पीठ इस मामले पर फैसला सुनाएगी।
अदालत मुख्य रूप से इस कानूनी सवाल को तय करेगी कि क्या संविधान के अनुच्छेद 326, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और उसके तहत बने नियमों के अनुसार चुनाव आयोग (ECI) के पास एसआईआर (SIR) लागू करने का अधिकार है या नहीं।
ममता बनर्जी, महुआ मोइत्रा समेत कई दिग्गजों ने खटखटाया था कोर्ट का दरवाजा
पिछले साल बिहार, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी जैसे राज्यों में वोटर लिस्ट का विशेष गहन संशोधन (SIR) किया गया था। इस प्रक्रिया के दौरान वोटर लिस्ट से कई नाम हटाए जाने पर विभिन्न राजनीतिक दलों ने गंभीर सवाल उठाए थे।
पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और टीएमसी (TMC) सुप्रीमो ममता बनर्जी ने खुद इस मामले में सुप्रीम कोर्ट जाकर अपनी दलीलें पेश की थीं। इसके अलावा टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा, कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल, एनसीपी (एसपी) सांसद सुप्रिया सुले और चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाली संस्था 'एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स' (ADR) ने भी इसके खिलाफ याचिकाएं दायर की थीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 29 जनवरी को इस मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
पिछले साल जून में जब बिहार में यह प्रक्रिया शुरू हुई, तभी सबसे ज्यादा याचिकाएं दाखिल की गईं क्योंकि वहां बड़ी संख्या में नाम वोटर लिस्ट से कटे थे। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस संशोधन प्रक्रिया पर कोई रोक नहीं लगाई थी, जिसके चलते सभी राज्यों में यह काम पूरा हो गया।
नागरिकता का प्रमाण नहीं है पहचान पत्र: सुप्रीम कोर्ट
पिछले साल 12 अगस्त को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने साफ किया था कि वोटर लिस्ट में नाम जोड़ना या हटाना पूरी तरह से चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि वह संशोधित वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने के लिए पहचान पत्र के तौर पर विशिष्ट पहचान पत्र को स्वीकार करे। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि यह पहचान पत्र किसी भी स्थिति में 'नागरिकता का प्रमाण' (Proof of Citizenship) नहीं माना जाएगा। इसके साथ ही चुनाव अधिकारियों को पहचान पत्र की सत्यता जांचने का पूरा अधिकार दिया गया था।
आज आने वाले फैसले से यह पूरी तरह साफ हो जाएगा कि भविष्य में चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण और संशोधन की प्रक्रिया का कानूनी आधार क्या होगा।