नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस (TMC) मे लंबे समय से चल रही अंदरूनी कलह अब बड़े राजनीतिक घटनाक्रम में बदल गई है। सूत्रों के अनुसार, लोकसभा मे अलग संसदीय दल बनाने से जुड़ी कानूनी और तकनीकी बाधाओं से बचने के लिए तृणमूल के 20 बागी सांसद नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) मे शामिल हो गए हैं। हालांकि नए दल में शामिल होने के बावजूद इन सांसदों ने भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन को समर्थन देने का फैसला किया है।
बंगाल, असम और त्रिपुरा पर रहेगा फोकस
सूत्रो का दावा है कि एनसीपीआई के जरिए बागी सांसद पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा मे अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की रणनीति पर काम करेंगे। माना जा रहा है कि आने वाले समय में यह मंच पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत की राजनीति में नई भूमिका निभा सकता है।
अमान्यता प्राप्त दल है NCPI
निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक, नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया फिलहाल एक अमान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है। 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव मे पार्टी ने दो सीटो पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन उसे महज 822 वोट मिले थे, जो कुल मतों का केवल 0.03 प्रतिशत था।
दिल्ली मे हुई हाई-प्रोफाइल बैठक
रविवार को दिल्ली मे बागी सांसदो की राजनीतिक गतिविधियां तेज रही। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात से पहले बागी सांसद केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पहुंचे। बैठक मे काकली घोष दस्तिदार, सुदीप बंद्योपाध्याय, शताब्दी राय, अरूप चक्रवर्ती, सायनी घोष, माला राय, बापी हलदार और प्रसून बंद्योपाध्याय समेत कई नेता मौजूद रहे।
निशिकांत दुबे की मौजूदगी से बढ़ी चर्चाएं
बैठक मे भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की मौजूदगी ने राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं को और तेज कर दिया। इसे बागी सांसदों और भाजपा नेतृत्व के बीच बढ़ती नजदीकियों के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
काकली घोष दस्तिदार का बड़ा दावा
इससे पहले काकली घोष दस्तिदार ने दावा किया था कि उनके गुट में दो और सांसद शामिल हो गए हैं, जिससे बागी सांसदों की संख्या 22 तक पहुंच गई है। हालांकि उन्होंने उन दो सांसदों के नाम सार्वजनिक नहीं किए।
TMC के लिए बढ़ सकती है मुश्किले
राज्य विधानसभा चुनाव मे खराब प्रदर्शन के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष लगातार बढ़ रहा था। अब 20 सांसदों के एक साथ अलग रास्ता चुनने से पार्टी नेतृत्व के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी हो सकती है। आने वाले दिनों में इस घटनाक्रम का असर राज्य और राष्ट्रीय राजनीति दोनो पर देखने को मिल सकता है।