नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लिए रविवार का दिन किसी बड़े राजनीतिक झटके से कम नहीं रहा। लंबे समय से चल रही अटकलों पर विराम लगाते हुए, टीएमसी के 20 बागी सांसदों ने 'नेशनल सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) में विलय कर लिया है। दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) की कानूनी जटिलताओं से बचने के लिए सांसदों ने पार्टी तोड़ने के बजाय इस क्षेत्रीय दल के साथ जुड़ने का रास्ता चुना है।
स्पीकर से मुलाकात और NDA को समर्थन
रविवार को दिल्ली में बागी सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से उनके सरकारी आवास पर मुलाकात की। काकली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में पहुंचे इन सांसदों ने स्पीकर को पत्र सौंपकर अलग बैठने की व्यवस्था करने की मांग की। इस हाई-प्रोफाइल बैठक से पहले बागी सांसदों ने केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर भी मुलाकात की, जहां भाजपा के वरिष्ठ सांसद निशिकांत दुबे भी मौजूद थे।
इस विलय के बाद, बागी खेमे ने साफ कर दिया है कि वे अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के साथ मिलकर काम करेंगे।
क्या है 'नेशनल सिटिजन्स पार्टी'?
जिस पार्टी में टीएमसी के बागी सांसदों का विलय हुआ है, वह त्रिपुरा की एक बहुत ही कम जानी-पहचानी पार्टी है। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार:
यह एक अस्वीकृत (Unrecognised) राजनीतिक दल है।
2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में इसने दो सीटों (चौमानु और कैलाशहर) पर उम्मीदवार उतारे थे।* इन दो सीटों पर पार्टी को कुल 822 वोट मिले थे, जो कुल मतों का मात्र 0.03% था।
अब इस विलय के साथ ही, इस पार्टी का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा की राजनीति पर रहने की उम्मीद है।
बैठक में कौन-कौन रहा शामिल?
केंद्रीय मंत्री के आवास पर हुई इस अहम बैठक में काकली घोष दस्तीदार के अलावा सुदीप बंदोपाध्याय, शताब्दी रॉय, अरूप चक्रवर्ती, सयानी घोष, माला रॉय, बापी हलदार और प्रसून बंदोपाध्याय जैसे दिग्गज नेता मौजूद थे। सूत्रों का कहना है कि विद्रोहियों की कुल संख्या 22 तक पहुंच सकती है, हालांकि अभी आधिकारिक तौर पर 20 नामों की पुष्टि हुई है।
TMC में मचा घमासान
बंगाल विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की करारी हार के बाद से ही पार्टी के भीतर असंतोष की आग सुलग रही थी। पिछले कुछ दिनों में कई सांसद खुलेआम नेतृत्व की आलोचना कर चुके हैं। जानकारों का मानना है कि टीएमसी के इस बड़े विभाजन ने ममता बनर्जी की पार्टी को लोकसभा में बुरी तरह कमजोर कर दिया है, जबकि भाजपा ने अपनी संख्या बल और प्रभाव को और मजबूत कर लिया है।