नई दिल्ली - प्रशांत महासागर में तेजी से मजबूत हो रहा El Niño भारत के मौसम को आने वाले महीनों में प्रभावित कर सकता है। इसका असर केवल मानसून तक सीमित रहने की संभावना नहीं है, बल्कि दिसंबर से फरवरी के बीच सर्दियों के तापमान और ठंड के दौर पर भी इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, ठंड पूरी तरह खत्म नहीं होगी, लेकिन लंबे समय तक चलने वाले ठंडे दौर और शीतलहर के दिनों में बदलाव संभव है।
अक्टूबर-दिसंबर में मजबूत हो सकता है El Niño
अमेरिकी मौसम विभाग के नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के पूर्वानुमान के मुताबिक अक्टूबर से दिसंबर के बीच El Niño काफी मजबूत हो सकता है। उपलब्ध अनुमान में इसे 1950 के बाद के सबसे शक्तिशाली El Niño घटनाक्रमों में से एक बताया गया है। प्रशांत महासागर की सतह का तापमान फिलहाल सामान्य से करीब 2 डिग्री सेल्सियस अधिक बताया जा रहा है। नवंबर के आसपास इसके चरम पर पहुंचने की संभावना जताई गई है। विश्व मौसम संगठन के पूर्वानुमान में उस समय समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से लगभग 2.9 डिग्री सेल्सियस ऊपर रहने की बात कही गई है।
भारत की सर्दी में क्या बदलाव आएगा?
El Niño का मजबूत होना यह नहीं दर्शाता कि भारत में इस बार सर्दी नहीं पड़ेगी। विशेषज्ञों के मुताबिक दिसंबर से फरवरी के बीच ठंड जारी रहेगी, लेकिन ठंडे दिनों और अपेक्षाकृत गर्म दिनों के बीच अंतर बढ़ सकता है। उत्तर-पश्चिम भारत में इसका प्रभाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि इस क्षेत्र के सर्दियों के मौसम में पश्चिमी विक्षोभ की भूमिका भी बेहद अहम रहती है।
पश्चिमी विक्षोभ क्यों हैं महत्वपूर्ण?
पश्चिमी विक्षोभ सर्दियों के दौरान उत्तर भारत में बारिश और हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। यही वजह है कि इनकी संख्या और सक्रियता का सीधा असर उत्तर भारत की ठंड पर पड़ता है। El Niño और पश्चिमी विक्षोभ के बीच संबंध भी देखा गया है। कुछ परिस्थितियों में El Niño के कारण पश्चिमी विक्षोभ की गतिविधि बढ़ सकती है। इसका असर बारिश, बर्फबारी और तापमान के रूप में सामने आ सकता है।
हजारों किलोमीटर दूर तक पहुंचता है असर
प्रशांत महासागर के पानी का तापमान असामान्य रूप से बढ़ने पर समुद्र के ऊपर हवा के उठने और नीचे उतरने की प्रक्रिया तथा वायुदाब का पैटर्न बदल जाता है। ये बदलाव भारत जैसे हजारों किलोमीटर दूर स्थित क्षेत्रों के मौसम को भी प्रभावित कर सकते हैं। मौसम विज्ञान में इस तरह के दूरगामी प्रभाव को टेली-कनेक्शन कहा जाता है। यही प्रक्रिया भारत के तापमान, बारिश और सर्दियों के पश्चिमी विक्षोभ को प्रभावित कर सकती है।
शीतलहर के दिनों में कमी की संभावना
मौसम विभाग के एक अध्ययन के अनुसार, 1971 से 2010 के बीच El Niño वाले वर्षों में भारत में शीतलहर के दिनों की संख्या और उनका विस्तार सामान्य वर्षों की तुलना में कम पाया गया था। इस आधार पर विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस बार भी अत्यधिक लंबे ठंडे दौर की संभावना कुछ क्षेत्रों में घट सकती है। हालांकि स्थानीय परिस्थितियां, पश्चिमी विक्षोभ और अन्य मौसमी प्रणालियां अंतिम स्थिति तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
मानसून पर भी पड़ रहा असर
El Niño का असर मानसून पर भी दिखाई देने लगा है। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक देश में अब तक बारिश सामान्य से लगभग 13 प्रतिशत कम रही है। स्काईमेट ने भी अपने शुरुआती अनुमान को संशोधित करते हुए पूरे मानसून में दीर्घ अवधि के औसत (LPA) का करीब 85 प्रतिशत बारिश होने का अनुमान जताया है।एजेंसी ने सूखे जैसी स्थिति की आशंका भी बढ़ाकर लगभग 70 प्रतिशत कर दी है। अप्रैल में उसका अनुमान LPA के 94 प्रतिशत के आसपास था।
फिलहाल क्या समझना जरूरी है?
मजबूत El Niño भारत में मौसम के सामान्य पैटर्न को प्रभावित कर सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पूरे देश में सर्दी कमजोर ही रहेगी। उत्तर-पश्चिम भारत में पश्चिमी विक्षोभ, पहाड़ी बर्फबारी और स्थानीय मौसम प्रणालियां इस बार ठंड की वास्तविक तस्वीर तय करने में बड़ी भूमिका निभाएंगी। आने वाले महीनों में El Niño की तीव्रता और पश्चिमी विक्षोभ की गतिविधि पर मौसम वैज्ञानिकों की नजर बनी रहेगी।