नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी लोकसभा सांसदों की सदस्यता को लेकर सियासी और कानूनी लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। TMC के राष्ट्रीय महासचिव और लोकसभा में पार्टी के नेता अभिषेक बनर्जी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से इस मामले में निर्देश और स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
अभिषेक बनर्जी ने उठाया सदस्यता का मुद्दा
अभिषेक बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर 20 बागी सांसदों के खिलाफ दायर अयोग्यता याचिकाओं पर जल्द फैसला लेने की मांग की थी। TMC का आरोप है कि इन सांसदों ने पार्टी के टिकट और चुनाव चिह्न पर जीत हासिल करने के बाद अलग राजनीतिक संगठन के साथ जाने का फैसला किया है।
जून में स्पीकर को सौंपी गई थीं 20 याचिकाएं
TMC ने 19 जून को लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष 20 अलग-अलग अयोग्यता याचिकाएं दाखिल की थीं। पार्टी ने संविधान की दसवीं अनुसूची यानी एंटी-डिफेक्शन कानून का हवाला देते हुए इन सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग की थी। अभिषेक बनर्जी का कहना है कि लंबे समय से याचिकाएं लंबित हैं और अब तक कोई संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई।
बागी सांसदों का क्या है दावा?
दूसरी ओर, बागी सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) के साथ जाने और अलग समूह के रूप में पहचान बनाए जाने का दावा किया है। यही दावा अब विवाद के केंद्र में है। TMC का कहना है कि केवल कुछ सांसदों के अलग होने को पूरे दल के विलय के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती।
क्या 20 सांसदों की सदस्यता जाएगी?
फिलहाल 20 सांसदों की सदस्यता रद्द नहीं हुई है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा कदम का मतलब यह है कि अदालत ने मामले में आगे की प्रक्रिया शुरू की है और लोकसभा अध्यक्ष के पक्ष/निर्देश जानने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। अंतिम फैसला सदस्यता रद्द करने के सवाल पर बाद की कानूनी प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकारी के निर्णय पर निर्भर करेगा।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब सबकी नजर लोकसभा अध्यक्ष के जवाब और आगे की सुनवाई पर है। अगर अयोग्यता याचिकाओं पर कार्रवाई होती है, तो 20 बागी सांसदों की लोकसभा सदस्यता और उनके अलग राजनीतिक समूह की मान्यता दोनों पर बड़ा असर पड़ सकता है। यह मामला TMC के भीतर चल रहे राजनीतिक संकट के साथ-साथ एंटी-डिफेक्शन कानून की व्याख्या के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है।