कोलकाता डेस्क: ‘जहां देखो राख, उसे उड़ा कर देखो, शायद कोई अनमोल रत्न मिल जाए’- यह कहावत आरामबाग के हाटबसंतपुर स्थित घोषाल परिवार की सदियों पुरानी दुर्गा पूजा की कहानी पर बिल्कुल सटीक बैठती है। मान्यता है कि चिता की राख से मिले नथ और नोआ आज भी मां दुर्गा के श्रृंगार का हिस्सा हैं। परिवार के अनुसार, ये आभूषण उन्हें एक साधक को मिले थे, जिन्हें महामाया ने सपने में श्मशान जाकर राख के बीच खोजने का आदेश दिया था। तभी से हर साल सप्तमी के दिन इन्हीं पारंपरिक आभूषणों से मां का श्रृंगार किया जाता है। स्थानीय लोगों के बीच ये आभूषण ‘आगुनखाकी की नथ और नोआ’ के नाम से मशहूर हैं। आस्था, रहस्य और सदियों पुरानी परंपरा से जुड़ी घोषाल परिवार की यह दुर्गा पूजा आज भी अपने आप में बेहद खास है।
क्यों कहा जाता है ‘आगुनखाकी’?
आरामबाग के हाटबसंतपुर में घोषाल परिवार की दुर्गा पूजा को कई सौ साल पुरानी परंपरा बताया जाता है। परिवार के सदस्यों के मुताबिक, उनके वंश में रामानंद नाम के एक साधक हुआ करते थे। उनकी पत्नी का नाम गोसाईंमणि था और दोनों निःसंतान थे। माना जाता है कि रामानंद ने ही घोषाल परिवार में दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी। परिवार की मान्यता के अनुसार, रामानंद के निधन के समय गोसाईंमणि भी उनकी चिता में कूद गई थीं। इसके बाद समय बीतता गया और परिवार में दुर्गा पूजा की परंपरा जारी रही। वर्षों बाद चिता की राख से मिले आभूषणों की कहानी सामने आई। इन्हीं आभूषणों के कारण नथ और नोआ को ‘आगुनखाकी’ नाम से जाना जाने लगा।
सपने में मिला महामाया का आदेश
परिवार की परंपरा के अनुसार, रामानंद के बाद वंश के एक अन्य साधक कृष्णकांत तर्कबागीश को एक रात महामाया ने सपने में दर्शन दिए। बताया जाता है कि सपने में उन्हें श्मशान जाकर चिता की राख खंगालने का आदेश मिला था। कृष्णकांत ने इस आदेश को देवी का संकेत मानकर श्मशान जाने का फैसला किया। वहां उन्होंने चिता की राख हटाकर खोजबीन की। परिवार की मान्यता के मुताबिक, इसी दौरान उन्हें नथ और नोआ मिले। इन आभूषणों को देखकर वह हैरान रह गए और इसे महामाया का आशीर्वाद माना। इसके बाद उन्हें सपने में ही इन आभूषणों को देवी की प्रतिमा पर पहनाकर पूजा करने का निर्देश मिला। तभी से यह परंपरा घोषाल परिवार की दुर्गा पूजा का अभिन्न हिस्सा बन गई।
गोसाईंमणि से जुड़ी खास मान्यता
घोषाल परिवार में इन आभूषणों को लेकर गोसाईंमणि से जुड़ी एक खास मान्यता भी प्रचलित है। परिवार के सदस्यों का कहना है कि गोसाईंमणि ही मानवी रूप में उनके वंश में आई थीं। उनके अनुसार, बाद में गोसाईंमणि ने ही देवी के दिव्य रूप में सपने में दर्शन दिए थे। इसी वजह से परिवार इन नथ और नोआ को बेहद पवित्र मानता है। सप्तमी की सुबह परिवार के सभी सदस्य पूजा स्थल पर एकत्र होते हैं। इसके बाद विधि-विधान के साथ देवी की प्रतिमा को ये पारंपरिक आभूषण पहनाए जाते हैं। परिवार के सदस्य शैलेन घोषाल के मुताबिक, पूजा में आज भी साधक रामानंद और गोसाईंमणि के नाम से संकल्प किया जाता है। आभूषणों को पूरे साल सुरक्षित और विशेष देखरेख में रखा जाता है।
प्रतिमा और ढाकी की भी पीढ़ियों पुरानी परंपरा
घोषाल परिवार की दुर्गा पूजा में सिर्फ नथ और नोआ ही नहीं, बल्कि प्रतिमा और ढाक से जुड़ी परंपराएं भी पीढ़ियों से चली आ रही हैं। परिवार के सदस्य बलराम घोषाल के मुताबिक, उनके यहां देवी की प्रतिमा एक ही परिवार के कलाकार पीढ़ी दर पीढ़ी बनाते आ रहे हैं। इसी तरह ढाक बजाने वाले परिवार भी लंबे समय से घोषाल परिवार की पूजा से जुड़े हुए हैं। यहां देवी की एकचाला प्रतिमा तैयार की जाती है। प्रतिमा निर्माण से लेकर पूजा की तैयारियों तक परिवार की पुरानी परंपराओं का विशेष ध्यान रखा जाता है। परिवार के सदस्य भी बारी-बारी से पूजा की जिम्मेदारी संभालते हैं। यही वजह है कि इस पूजा में परिवार की कई पीढ़ियों की आस्था और परंपरा एक साथ दिखाई देती है।
अष्टमी के भोग में मछली, बलि की भी परंपरा
घोषाल परिवार की दुर्गा पूजा में भोग की परंपरा भी बाकी आयोजनों से अलग बताई जाती है। परिवार के सदस्यों के मुताबिक, अष्टमी के दिन देवी को चावल, खिचड़ी और पायस का भोग लगाया जाता है। इसके साथ ही देवी को मछली भी भोग के रूप में अर्पित की जाती है। परिवार में बलि की परंपरा भी लंबे समय से चली आ रही है। बताया जाता है कि बकरे की बलि के साथ खीरा और पेठा आदि की भी बलि देने की परंपरा है। इन रस्मों को परिवार की पुरानी पूजा पद्धति का हिस्सा माना जाता है। हालांकि, इन सभी परंपराओं का पालन परिवार के सदस्य पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार करते हैं।
बाढ़ के पानी से जुड़ी है एक और मान्यता
घोषाल परिवार की दुर्गा पूजा से जुड़ी एक और रोचक जनश्रुति बाढ़ के पानी को लेकर है। परिवार और स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित कहानी के अनुसार, एक समय दुर्गा पूजा के दौरान मंदिर के सामने काफी पानी जमा हो गया था। उस समय साधक देवी को बलि देने को लेकर चिंतित हो गए थे। बताया जाता है कि अचानक उन्होंने देखा कि मंदिर के सामने जमा पानी गायब हो गया है। इस घटना को उन्होंने देवी का चमत्कार माना। इसके बाद साधक ने खुशी के साथ देवी को बलि अर्पित की। हालांकि, यह घटना स्थानीय जनश्रुति और पारिवारिक मान्यता के रूप में बताई जाती है। आज भी इस कहानी का जिक्र घोषाल परिवार की पुरानी दुर्गा पूजा की परंपराओं के साथ किया जाता है।
दशमी के दिन होता है विसर्जन
घोषाल परिवार में दुर्गा पूजा की परंपराएं दशमी तक चलती हैं। परिवार के मुताबिक, यहां देवी की प्रतिमा का विसर्जन दशमी के दिन ही किया जाता है। पूजा के दौरान परिवार के सदस्य अपनी-अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं और पुरानी परंपराओं का पालन करते हैं। सप्तमी को देवी को ‘आगुनखाकी की नथ और नोआ’ पहनाने से लेकर अष्टमी के भोग तक कई खास रस्में निभाई जाती हैं। परिवार के लिए ये सिर्फ पूजा की रस्में नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों से चली आ रही विरासत हैं। नथ और नोआ को आज भी विशेष सम्मान के साथ सुरक्षित रखा जाता है। घोषाल परिवार की यह दुर्गा पूजा स्थानीय लोगों के बीच अपनी अनोखी मान्यताओं और सदियों पुरानी परंपराओं के कारण अलग पहचान रखती है।