गीता के सातवें अध्याय को ज्ञान-विज्ञान योग कहा जाता है। इसमें श्रीकृष्ण संसार और उसकी प्रकृति के बारे में अर्जुन को समझाते हैं। मनुष्य जिस संसार को अपना सब कुछ मानकर उसमें उलझा रहता है उसे भगवान की माया से जोड़कर बताया गया है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह माया अत्यंत कठिन है लेकिन जो व्यक्ति सच्चे भाव से भगवान की शरण में आता है उसके लिए इससे पार पाना संभव होता है। यह अध्याय समझाता है कि संसार में रहते हुए भी मन को ईश्वर से जोड़कर रखना जरूरी है। माया के बंधन से मुक्त होने का मार्ग भक्ति और ज्ञान के समन्वय में बताया गया है।
आठवां अध्याय में मृत्यु का सच
आठवें अध्याय का नाम अक्षरब्रह्म योग है। इसमें जीवन के साथ मृत्यु और मृत्यु के बाद की गति से जुड़े गहरे प्रश्नों को समझाया गया है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि मनुष्य के अंतिम समय के विचारों का विशेष महत्व होता है। जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर का त्याग होता है उसे आगे की गति से जोड़कर देखा गया है। इसलिए जीवन भर ईश्वर का स्मरण करने की सीख दी गई है। संदेश यही है कि अंतिम समय में मन उसी ओर जाता है जिसकी आदत उसने पूरे जीवन में बनाई है। मृत्यु के क्षण की तैयारी जीवन की साधना से जुड़ी है।
नौवें अध्याय में भाव और भक्ति
राजविद्या राजगुह्य योग नाम से मशहूर नौवां अध्याय भक्ति और ईश्वर के प्रति समर्पण की बात करता है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि भगवान के लिए भक्ति में दिखावा नहीं बल्कि सच्चा भाव महत्वपूर्ण है। इसीलिए प्रेम से अर्पित किया गया पत्ता फूल फल या जल भी भगवान स्वीकार करते हैं। इस अध्याय में अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित करने की शिक्षा भी मिलती है। यानी दान तप या कोई भी काम केवल अपने अहंकार के लिए नहीं बल्कि ईश्वर को अर्पित भाव से करने की बात कही गई है। सच्ची भक्ति में सरलता और समर्पण का महत्व बताया गया है।
जीवन में गीता की प्रासंगिकता
ये अध्याय आज के जीवन में भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने प्राचीन काल में थे। माया के मोह में फंसकर इंसान तनाव और असंतोष का शिकार हो जाता है। गीता का सातवां अध्याय इस मोह से निकलने का रास्ता दिखाता है। आठवां अध्याय याद दिलाता है कि मृत्यु निश्चित है इसलिए जीवन को सार्थक बनाना जरूरी है। नौवां अध्याय सिखाता है कि बाहरी आडंबर से ज्यादा आंतरिक भाव महत्वपूर्ण है। इन शिक्षाओं को अपनाकर व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में संतुलन और शांति पा सकता है। गीता के ये अंश मन की उलझनों को सुलझाने में सहायक हैं।
मन को ईश्वर से जोड़ने का मार्ग
श्रीकृष्ण बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि संसार में रहते हुए भी मन को ईश्वर से जोड़े रखना चाहिए। माया कठिन है लेकिन शरण आने वाले के लिए पार पाना संभव है। अंतिम समय के विचारों का महत्व बताकर जीवन भर स्मरण की आदत डालने की प्रेरणा दी गई है। भक्ति में सच्चा भाव ही सबसे बड़ा साधन है। चाहे छोटा सा पत्ता या जल ही क्यों न हो प्रेम से अर्पित करने पर भगवान स्वीकार करते हैं। कर्मों को समर्पित भाव से करने से अहंकार कम होता है और आंतरिक शांति मिलती है। यह मार्ग सरल और सबके लिए सुलभ है।
अंतिम समय की तैयारी
आठवें अध्याय में मृत्यु के समय मन की स्थिति को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है। जिस भाव में शरीर छोड़ा जाता है वही आगे की यात्रा तय करता है। इसलिए जीवन भर ईश्वर का स्मरण करने की आदत डालनी चाहिए। अंतिम क्षण अचानक आते हैं इसलिए नियमित साधना जरूरी है। गीता का संदेश है कि मृत्यु से डरने के बजाय जीवन को सही दिशा में जीना चाहिए। भक्ति और स्मरण से मन तैयार रहता है। इन अध्यायों की शिक्षाएं जीवन मृत्यु और भक्ति के गूढ़ रहस्यों को सरल भाषा में समझाती हैं और मनुष्य को सही मार्ग दिखाती हैं।